जेल की दीवारें कितनी भी ऊंची हों, उसकी नींव भारत के संविधान में निहित कैदियों के अधिकारों को सुनिश्चित करने वाले कानून के शासन पर रखी जाती है। यह तिहाड़ जेल में हिरासत में हुई हिंसा में जान गंवाने वाले अंकित गुर्जर के संविधानिक अधिकारों का हनन है। हाईकोर्ट ने उक्त टिप्पणी करते हुए जेल में कैदियों से उगाही व कैदियों से मारपीट के मामले की जांच के लिए सीबीआई जांच के निर्णय को उचित ठहराते हुए की।
न्यायमूर्ति मुक्ता गुप्ता ने जेल में तैनात डॉक्टरों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह अकल्पनीय है कि जब आधी रात को जेल के डॉक्टर ड्यूटी पर आए, तो उन्होंने अंकित पर कई चोटें नहीं देखीं। अदालत ने कहा जब अंकित घायल हो गया और जीवित था, यदि उसे उचित उपचार प्रदान किया जाता, तो उसकी जान बचाई जा सकती थी।
अदालत ने कहा न केवल इस बात की जांच जरूरी है कि अंकित को बेरहमी से पीटने का अपराध किसने किया, जिसके परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हो गई। बल्कि सही समय पर उचित उपचार उपलब्ध नहीं कराने में जेल डॉक्टरों की भूमिका की भी उचित जांच की जरूरत है।