हम राजधानी को लंदन बनाने की सोच रहे है लेकिन अधिकांश मार्किटों में अवैध कब्जों की भरमार है। जब तक स्ट्रीट वेंडर्स की नीति को लागू नहीं किया जाता तब तक हम इसे लंदन बनाने के बारे में कैसे सोच सकते हैं। अदालत ने स्ट्रीट वेंडर नीति को चुनौती याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति विपिन सांघी व न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा बिना योजना के आखिर हम कैसे दिल्ली को लंदन बनाने के बारे में सोच रहे हैं। पीठ ने कहा कि निश्चित तौर पर स्ट्रीट वेंडिंग कई लोगों को रोजगार प्रदान करता है। विशेष तौर पर उन्हें जो समाज के निचली तबके से आते हैं, लेकिन पीठ ने उन लोगों के अधिकारों के संतुलन पर जोर दिया जो दुकानों को किराए पर लेते हैं और जो लोग बाजार में मार्केटिंग के लिए जाते हैं।
पीठ ने नेहरू प्लेस और कनाट प्लेस जैसी जगहों का जिक्र करते हुए मौखिक रूप से कहा कि आप कनाट प्लेस में चल भी नहीं सकते क्योंकि जगह-जगह पर विक्रेताओं का कब्जा है और यह एक व्यवसाय बन गया है। पीठ ने कहा कि नेहरू प्लेस में आप चल भी नहीं सकते क्योंकि स्ट्रीट वेंडर्स ने इसे अपना स्थायी व्यवसाय बना लिया है।
पीठ ने कहा कि नेहरू प्लेस में आग की घटना का हमें स्वत: संज्ञान लेना पड़ा। नेहरू प्लेस मार्केट की स्थिति एक झुग्गी की तरह है। आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए एक विशेष क्षेत्र में अनुमेय विक्रेताओं की संख्या पर निर्णय लेने की जरूरत है।
30 अक्तूबर को होगी मामले की अगली सुनवाई
पीठ ने कहा कि अदालत स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट-2014 की चुनौती पर गौर करेगा। हालांकि पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत रेहड़ी-पटरी के खिलाफ नहीं है और यह प्रतिकूल मुकदमेबाजी का मामला नहीं है।
पीठ ने कहा कि हम सब रेहड़ी-पटरी वालों से खरीदारी करते हुए बड़े हुए हैं। हम आज भी रोजमर्रा की चीजें खरीदने के लिए माल के बजाए रेहड़ी-पटरी के विक्रेताओं के पास जाते हैं। कोई भी रेहड़ी-पटरी वालों के खिलाफ नहीं है, हम बस चाहते हैं उस शहर में उनकी वजह से बेवजह भीड़ नहीं हो। अगर हमें कार्रवाई ठीक लगती है तो हम आगे बढ़ेंगे, अगर हमें कमियां मिलती हैं, तो हम सुझाव देंगे। अदालत ने मामले की सुनवाई 30 अक्तूबर तय की है।