अदालत ने अलग रह रही पत्नी को भरण-पोषण के भुगतान को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा एक पीड़ित महिला को आर्थिक सहायता की आवश्यकता होती है और प्रत्येक सक्षम पुरुष अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य होता है न कि बहाने देने के लिए।
प्रधान जिला और सत्र न्यायाधीश रमेश कुमार ने कहा यह स्थापित कानून है कि पति होने के नाते संबंधित व्यक्ति अपनी पत्नी को भरण-पोषण प्रदान करने के अपने नैतिक कर्तव्य से बच नहीं सकता है। घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 का उद्देश्य एक महिला की आर्थिक स्वतंत्रता को मजबूत करना है।
इस मामले में महिला ने अपने पति के खिलाफ घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया था। फैमिली कोर्ट ने अपने निर्णय में पति को 6,500 रुपये मासिक भरण-पोषण का भुगतान करने का निर्देश दिया था, जिसे पति ने चुनौती दी है।
महिला ने साबित किया पति भुगतान में सक्षम
महिला ने दावा किया था कि उसका पति अपने परिवार के साथ दक्षिण दिल्ली के एक पॉश इलाके में एक हवेली में रहता था और उसकी 2 लाख रुपये की आय थी। उसने यह भी प्रस्तुत किया कि उसके पति के परिवार के पास इलाके में दिल्ली दूध योजना (डीएमएस) के तहत एक दूध वेंडिंग बूथ है और वे 'जीवन के सभी सुखों का आनंद ले रहे हैं।'
पति ने दायर याचिका में तर्क दिया कि उसे अपने माता-पिता की देखभाल करनी है और उसकी दुकानें बंद होने के बाद उसकी कोई आय का कोई साधन नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि वह मुश्किल से अपनी आजीविका का प्रबंधन कर रहा हैं और फैमिली कोर्ट ने इन तथ्यों पर ध्यान नहीं दिया।
अदालत ने फैमिली कोर्ट के निर्णय को उचित ठहराते हुए कहा कि यह उल्लेख करना उचित है कि एक पीड़ित महिला को उसके साथ घरेलू संबंध में एक व्यक्ति द्वारा किए गए घरेलू हिंसा के मद्देनजर आर्थिक सहायता की आवश्यकता होती है। यह स्थापित कानून है कि प्रत्येक सक्षम व्यक्ति अपनी पत्नी को बनाए रखने के लिए बाध्य है और बहाने देकर इस जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते।