झूठ बोलकर किया जमीन का खेल
हसरत अली ने बताया कि फारुख को जमीन देने के बारे में पूछे जाने पर जीडीए के अफसरों ने कहा कि उसकी जो जमीन अधिग्रहीत की गई है, उसके बदले में उसे गोविंदपुरम में प्लॉट दिया गया है। इसे पुनर्वास योजना के तहत जमीन की अदला-बदली बता दिया गया। इस पर गांव के लोग चुप बैठ गए।
आरटीआई से खुली धोखाधड़ी की पोल
प्राधिकरण के अफसरों की बात ग्रामीणों के गले नहीं उतर रही थी। कारण यह था कि फारुख की जिस जमीन का अधिग्रहण हुआ, वह कब्रिस्तान के पास और सिर्फ 150 वर्ग मीटर थी। उसे जो जमीन दी गई, वह महंगे इलाके गोविंदपुरम में थी और चार गुना से ज्यादा ( 625 वर्ग मीटर ) थी। इस पर गांव के लोगों ने प्राधिकरण में आरटीआई लगाकर पूछा कि फारुख को उसकी जमीन का मुआवजा मिला था या नहीं। छह फरवरी 2014 को जवाब आया, उसे मुआवजा दिया गया था। इसी से पोल खुल गई। जिस जमीन का मुआवजा मिल चुका था, उसके बदले में जमीन कैसे दी जा सकती है।
केस दर्ज होने में लगे सात महीने
आरटीआई में मिले जवाब को आधार बनाकर अब्दुल रहमान ने एसपी देहात को शिकायती पत्र 27 अक्तूबर 2021 को दिया। सीओ से इसकी जांच कराई गई। इसमें सात महीने लग गए। जांच रिपोर्ट मिल जाने पर एसपी देहात ने केस दर्ज करने के निर्देश मसूरी थाना पुलिस को दिए। अब एफआईआर में लगाए गए आरोपों की जांच थाना पुलिस करेगी।
केस दर्ज होने से पहले क्लीन चिट
एसपी देहात डॉ. ईरज रजा का कहना है कि शिकायती पत्र की जांच में साफ हो गया है कि धोखाधड़ी के इस मामले में जीडीए के किसी अधिकारी या कर्मचारी की कोई भूमिका नहीं मिली है। तहरीर के आधार पर केस तो दर्ज कर लिया है, लेकिन आगे की जांच में फारुख और उसके परिवार के लोगों को ही आरोपी मानकर कार्रवाई होगी।