फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सियासी खेल का मोहरा बना है ‘अटाली’ दंगा

Wed, 29 Jul 2015 06:18 PM IST
मुकेश शर्मा/अमर उजाला, गुड़गांव
विज्ञापन
विज्ञापन
दो माह पहले 25 मई को उपजे मामूली विवाद ने अटाली गांव में दो बार सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया। इस दंगे में विवाद का केंद्र जमीन है। शुरुआत जमीन पर दोनों समुदाय के हक जताने से शुरू हुई, जिसके बाद मामला कोर्ट में गया।
विज्ञापन


कभी हार-जीत का फैसला आने के बाद विवाद आगे बढ़ गया। फिलहाल गांव के माहौल में अशांति बरकरार है। जानकारों की मानें तो यहां सियासी ताकतों ने महज इसलिए झगड़ा कराया, क्योंकि उन्हें लगता है कि सांप्रदायिक टकराव के बगैर वह चुनाव जीत ही नहीं सकते।
 
दरअसल, सांप्रदायिक दंगों पर हुए अध्ययन यह बताते हैं कि सांप्रदायिक दंगे होते नहीं हैं, बल्कि कराए जाते हैं। इन्हें कराने वालों के कुछ उद्देश्य होते हैं, जो आम तौर पर राजनीतिक और चुनावी जरूरत से निर्देशित होते हैं।
विज्ञापन


स्थानीय और छोटे-छोटे विवाद सांप्रदायिक दंगों के रूप में बड़े भयावह हो जाते हैं। अटाली गांव भी सियासी ताकतों की राजनीति का शिकार बना। इसके परिणामस्वरूप अल्पसंख्यकों में जहां अपना दबदबा दिखाने की ललक दिखाई देती है तो वहीं, बहुसंख्यक तबके में भी अल्पसंख्यकों को उनकी हैसियत बताने का भाव बढ़ा है।

इस तनाव से पहले भी पंचायतें बुलाईं गई थीं। दोनों समुदायों के बीच संबंध बनते-बिगड़ते प्रतीत हो रहे थे। मामले में नया मोड़ तब आया जब पुलिस व प्रशासन ने एक फैसले के अनुरूप हालातों को समझे बिना गांव में धार्मिक स्थल का निर्माण कराना चाहा। उसपर राजनीतिक महत्वकांशा रखने वाले सियासतदानों ने मामले को शांत करने की बजाए आग में घी डालने का काम किया।

सियासी दखल बना तनाव की वजह
मास्टर धर्मवीर मानते है कि दंगे सियासी फायदे के लिए कराए गए। कुछ राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाली सियासी ताकतों ने वोट के लिए लोगों के बीच जाति और मजहब का भेद पैदा किया।

उन्होंने बताया कि अटाली में कभी भी दंगा नहीं हुआ, 1947 में भी नहीं। वर्षों से दो समुदाय सद्भाव के साथ रहते आए हैं। लेकिन सियासी दखल के बाद ही गांव में सांप्रदायिक तनाव भड़का।

असामाजिक तत्वों की हरकत
खंदावली गांव के मास्टर खलील ने बताया कि अटाली में अधिकतर लोग खेती पर निर्भर हैं। इलाके में ज्यादा काम न होने की वजह से असामाजिक तत्त्व सक्रिय रहते हैं। ऐसे लोग मौके  की तलाश में रहते हैं।

ये लोग जरा-जरा से मामले को तिल का ताड़ बनाने में माहिर होते हैं। लोगों को इनको चिन्हित करना होगा। किसी भी तरह इन्हें सक्रिय नहीं होने देना चाहिए।

दंगे में मरता है सिर्फ गरीब
सेक्टर-6 स्थित ईदगाह के हाजी रमजान खान कहते है कि धार्मिक उकसावे में आने वाले लोगों को यह समझना होगा कि दंगों में हर वर्ग का नुकसान होता है। आगजनी होती है तो हर किसी का घर जलता है।

दंगों में सबसे ज्यादा प्रभावित होता है गरीब। गरीब को हर दिन कमा कर लाना होता है। अटाली के दंगों की चपेट में इसबार भी गरीब का ही नुकसान ज्यादा हुआ है।
विज्ञापन

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें