दरअसल जिकरा के पिता शहजाद ओखला मंडी में सब्जी विक्रेता हैं। वे अपने परिवार के साथ दिल्ली गेट स्थित डिलाइट सिनेमा के पास ही रहते हैं। 17 अगस्त को उनकी बेटी जिकरा बेड से नीचे गिरने की वजह से पैर में फ्रैक्चर आया। रोती बिलखती मासूम को लेकर जब मां-बाप अपने नजदीक लोकनायक अस्पताल पहुंचे तो वहां डॉक्टरों ने एक्सरे में फ्रैक्चर की पुष्टि की। ऐसी स्थिति में बच्ची को भर्ती करना भी जरूरी था और उसे दर्द से राहत देना भी लेकिन जिकरा काफी डरी-सहमी हुई थी।
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डॉक्टर जैसे ही उसे छूते वह अपनी मां की गोद में छटपटाने लगती। काफी मशक्कत के बाद भी जब उस पर नियंत्रण नहीं पा सके तो जिकरा की मां फरीना ने डॉक्टरों से गुडिय़ा लाने की मंजूरी मांगी। ये गुडिय़ा जकिरा को उसकी नानी ने गिफ्ट की थी। इस गुडिय़ा का नाम परी था। जिकरा का परी से लगाव इस कदर था कि दूध पीने से लेकर सोने तक उसे हर दम परी का साथ अच्छा लगता था।
अस्पताल में अपनी सहेली परी को देख जिकरा खिलखिला गई। ये देख हर कोई भौचक्का सा था। परी की आड़ में डॉक्टरों ने इंजेक्शन तो लगा दिया, लेकिन जिकरा को बिस्तर पर नहीं रख पा रहे थे। तभी डॉक्टर के जहन में ख्याल आया और उन्होंने पहले गुडिय़ा को पट्टी बांधी, फिर उसके दोनों पैर रस्सी से बांध कर ऊपर लटका दिए।
परी की इस स्थिति को देख पता नहीं जिकरा ने क्या महसूस किया? वह भी चुपचाप पट्टी बंधवाती गई और डॉक्टरों ने गुडिय़ा की तरह उसके पैरों को भी बांध ऊपर लटका दिया। इस बीच जिकरा न रोई, न कुछ कहा। डॉक्टरों का कहना है कि दो साल से कम उम्र के बच्चों में हड्डी टूटने पर उन्हें इस तरह रखा जाता है ताकि हड्डी के जुड़ने में आसानी हो, लेकिन जिकरा के मूवमेंट देख डॉक्टर भी दंग थे कि फ्रैक्चर के बाद भी ये बच्ची बिस्तर पर अपनी गुडिय़ा के साथ करवटें लेती रहती थी।
कमरे में लगाए खबरों के फ्रेम
पिता शहजाद ने बताया कि बच्ची के घर वापस आने की खुशी वे बता नहीं सकते। उन्होंने अमर उजाला में प्रकाशित सभी खबरों को फ्रेम कराकर जिकरा के कमरे में लगाया है। शहजाद ने कहा कि उन्होंने कभी सपने भी नहीं सोचा था कि उनकी बच्ची के लिए देश के लाखों करोड़ों लोगों से इतना प्यार मिलेगा। उन्होंने इसके लिए अमर उजाला का आभार भी व्यक्त किया।
इसी साल दिसंबर में केस होगा तैयार
डॉक्टरों के अनुसार जिकरा की कहानी को जल्द ही मेडिकल जर्नल में रूप देने का प्रयास शुरू कर दिया है। इसी वर्ष दिसंबर में पीडिएट्रिक ऑर्थोपेडिक्स सर्जन सोसायटी ऑफ इंडिया की ओर से इस केस का प्रतिनिधित्व किया जाएगा। डॉक्टरों का कहना है कि जिकरा की कहानी वाकई पूरे चिकित्सीय विज्ञान के लिए एक बड़ा उदाहरण बन गई है। देश के हर अस्पताल में इस तरह से भी बच्चों के उपचार पर ध्यान दिया जा सकता है।