खुद के आशियाने का सपना लेकर फ्लैट खरीदार अपनी गाढ़ी कमाई बिल्डरों के हाउसिंग प्रोजेक्ट में लगाता है, ताकि किराए के घर से निजात मिल जाए और भविष्य सुकून से गुजार सके, लेकिन इसके लिए तमाम दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं।
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बायर्स को फ्लैट का पजेशन पाने के लिए तय समय से ज्यादा इंतजार करना पड़ता है। इसके अलावा अपार्टमेंट परिसर की सुविधाओं (जिम, क्लब, स्वीमिंग पूल आदि) के लिए और भी ज्यादा समय लगता है।
फ्लैट बन जाने के बाद इन सुविधाओं को विकसित किया जाता हैं। आधी-अधूरी सुविधाएं देकर बिल्डर पल्ला झाड़ लेते हैं। उस पर ये पांच मुद्दे ऐसे हैं, जिनसे सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।
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बढ़ाते हैं फ्लैटों की कीमत
इन दिनों फ्लैट बायर्स, बिल्डरों की ओर से दी जाने वाली मूलभूत सुविधाओं के लिए भी तरस रहे हैं। ऊपर से किस्त और किराए की मार भी झेलते हैं।
बुकिंग के समय बायर्स जिस कीमत पर फ्लैट तय करता है, पजेशन मिलने तक उसके रेट में काफी इजाफा हो जाता है।
इनक्रीज एरिया केलकुलेशन के नाम पर बिल्डर रेट बढ़ा देते हैं, जिसके बारे में बायर्स को पहले नहीं बताया जाता, लेकिन बिल्डर पजेशन के समय बढ़ी हुई कीमत बताते हैं, जिससे बायर्स को मजबूरी में इस रकम का भी इंतजाम करना पड़ता है। इसको लेकर कई बार शिकायत भी की गई है।
पजेशन में लगता है काफी वक्त
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में सबसे बड़ी समस्या फ्लैट खरीदारों को समय पर पजेशन न मिल पाना है।
नोएडा, ग्रेनो, ग्रेनो वेस्ट और एक्सप्रेसवे पर ऐसे तमाम प्रोजेक्ट हैं जो चार से पांच साल की देरी से चल रहे हैं। पजेशन की समयसीमा खत्म हो चुकी है, लेकिन निर्माण अभी भी जारी है।
इसका सीधा असर खरीदारों पर पड़ता है, जो फ्लैट की किस्त और किराए की दोहरी मार झेलते रहते हैं।
रजिस्ट्री के बिना पजेशन
प्राधिकरण से अनुमति न मिलने के कारण फ्लैटों की रजिस्ट्री नहीं होती, जिससे बायर्स को मालिकाना हक नहीं मिलता।
बिल्डर भी बिना रजिस्ट्री के बायर्स को पजेशन दे देते हैं। बाद में बायर्स के नाम रजिस्ट्री करने से पहले कई तरह के शुल्क वसूलते हैं।
यही नहीं एफएआर, कंपलीशन समेत कई ऐसे दंश हैं जो बायर्स को झेलने पड़ते हैं। इसके अलावा और भी कई मुद्दे हैं, जो बायर्स को खून के आंसू रुलाते हैं।
प्राधिकरण ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट का निर्माण पूरा होने पर पजेशन लेटर जारी करता है। उससे पहले अपने सभी बकाया भुगतान जमा करवा लेता है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में ऐसे कई बिल्डरों के प्रोजेक्ट हैं, जिनका भुगतान प्राधिकरण में बकाया है और पजेशन नहीं मिल रहा।
बार-बार पड़ती एफएआर की मार बायर्स को बार-बार एफएआर बढ़ाए जाने की मार झेलनी पड़ती है। क्योंकि प्राधिकरण एफएआर का शुल्क लेकर ही अनुमति देता है। बिल्डर निर्माणाधीन प्रोजेक्ट में भी इसका लाभ लेने लगते हैं। इससे प्रोजेक्ट के पजेशन में और देरी हो जाती है।