समय-समय पर तरुण प्रीत सिंह को 1997 के वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन याद आते हैं, जब मध्य दिल्ली के कनॉट प्लेस में पुलिस मुठभेड़ में उन्हें मौत के घाट उतारने की कोशिश हुई थी। इस घटना में उन्होंने अपने दो दोस्तों को खो दिया था। वह उस समय अपने शुरुआती 20 के दशक में थे, जब उन्हें सात बार गोली मारी गई।
उनकी सर्जरी हुई और अगले पांच साल उन्हें अपनी चोटों से उबरने लगे। इस वजह से मजबूरन उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा। अब 25 साल बाद उसके सिर में एक छर्रे और उसके दाहिने हाथ में मामूली दिव्यांगता उस काले दिन की निरंतर याद दिलाती है। उन्होंने बताया कि वह अपने जीवन के साथ बहुत कुछ कर सकते थे।
अगर वह गोलीबारी में नहीं फंसते। उनका जीवन पूरी तरह से अलग होता। उनकी चोटों के बाद के प्रभाव उन्हें सामान्य जीवन जीने से रोकते हैं। उन्हें अक्सर सिरदर्द होता है और सर्दियों में विशेष रूप से परेशानी होती है। उन्होंने कहा कि वह एक सामान्य जीवन जीने की कोशिश करते हैं, लेकिन, चोटों ने उन्हें ऐसा कभी नहीं करने दिया।
इस वजह से वह न तो भारी काम कर सकते हैं और न ही तनाव ले सकते हैं। वर्तमान में दो बच्चों के पिता प्रीत एक कपड़े की दुकान में काम करते हैं और प्रति माह केवल आठ हजार रुपये कमाते हैं। परिवार का खर्च चलाने के लिए उनकी पत्नी भी एक स्थानीय अस्पताल में काम करतीं हैं और प्रति माह तीन हजार रुपये कमातीं हैं।