शुभ स्वागत। उत्तराखंड का निजाम बदल गया है। नए मुख्यमंत्री हरीश रावत को सपनों का सौदागर नहीं कर्मनिष्ठ बाजीगर बनना होगा। चुनौतियां और दुश्वारियां वे जितनी सोच रहे होंगे, उससे कहीं ज्यादा होंगी। अपनों से भी और बाहरियों से भी।
शनिवार को नेता चयन के मसले पर कांग्रेस विधानमंडल दल की बैठक में अपने खिलाफ उठे सुरों से उन्हें अंदाजा लग गया होगा कि वे कांटों का ताज पहनने जा रहे हैं। आगे-आगे कैसी चुनौतियां हैं-इसका उन्हें पर्याप्त अहसास हो गया होगा।
रावत से उम्मीदें
13 साल के इस राज्य के हरीश रावत आठवें मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। हर बार नए मुख्यमंत्री के आने पर राज्य की जनता की उम्मीदों पर चमक आ जाती है कि शायद ये वाला उसकी दिक्कतें कम कर सकेगा, लेकिन दुर्भाग्य कि घोषणाओं और आश्वासनों के सिवा कुछ नहीं मिलता और जनता हर बार ठगी रह जाती है।
बार-बार ठगे जाने का अहसास क्या होता है यह हरीश रावत बखूबी समझते होंगे। दो बार पहले मुख्यमंत्री की कुर्सी उनके पास आते-आते खिसक चुकी है और वे ठगे-से रह गए। हरीश रावत को अगर अपना यह दर्द याद होगा तो वे जनता का भी दर्द समझ सकेंगे। उनके साथ इंसाफ हुआ, अब जनता से इंसाफ हो-इस गैर-जस्टिस मुख्यमंत्री से यही उम्मीद है।
विशुद्ध उत्तराखंडी मुख्यमंत्री
अभी दो आज दो-उत्तराखंड राज्य दो- अलग राज्य के लिए उठे ऐसे नारों में हरीश रावत के सुर भी शामिल रहे हैं। वे कई आंदोलनों में जनता के साथ खड़े दिखे। इस राज्य को उन्होंने घुट्टी में पिया है। हरीश रावत की परम योग्यता के बारे में यह तक कहा जा रहा है कि वे पहले विशुद्ध उत्तराखंडी मुख्यमंत्री हैं।
अब तक के कांग्रेसी मुख्यमंत्री स्काईलैब की तरह दिल्ली से टपकते रहे हैं वे चाहे पृथक राज्य विरोधी नारायणदत्त तिवारी हों या पृथक राज्य निरपेक्ष विजय बहुगुणा। इनका पहाड़ से इतना सीधा वास्ता कभी नहीं रहा जैसा हरीश रावत का है। वे पहाड़ और पहाड़ियों के दुख-दर्द समझते हैं (भले ही वे संसद में शुद्ध मैदानी इलाके हरिद्वार की नुमाइंदगी करते आए हैं) अब हरीश रावत की यही खांटी पर्वत-पुरुष की पहचान उनके लिए चुनौती भी है। जाहिर है कि जनता की उनसे और भी ज्यादा उम्मीदें हैं और होनी भी चाहिए।
काम करना होगा
हरीश रावत को यह तो पता हो ही जाएगा कि क्या करना है, यह जानना भी बेहद जरूरी है कि क्या नहीं करना है। कुछ कर गुजरने की ललक ढकोसले के मुलम्मे से बाहर निकालनी होगी। इच्छाशक्ति दून-दिल्ली की हवाई यात्राओं में जाया न हो, हकीकत की जमीन पर निढाल पड़े सिस्टम को काम पर लगाना होगा।
अभी तक तो हाल यह रहा कि दावों और घोषणाओं की ‘अमृत वर्षा’ होती रही लेकिन ‘प्रगति की धरती’ सूखी ही रह गई। पिछली सरकार के खाते में बताने-दिखाने के लिए बहुत कम है और गंवाने का हिसाब ज्यादा। नीतियां तो खूब बनीं लेकिन सवाल नीयत का उठ गया।
आपने संविधान की शपथ तो ले ली, अब मन में ये बातें भी गांठ बांध लीजिए। आपको तमाम विघ्न-बाधाओं के बीच काम करके दिखाना है। जनता को रिजल्ट चाहिए। महज संकल्प-शपथ से उसे भरमाने की कोशिश न करें क्योंकि पंचायत चुनाव सिर पर है और उसके कुछ ही बाद संसदीय चुनाव...और ये पब्लिक है...सब जानती है।
और चलते-चलते...
प्रबिसि नगर कीजै सब काजा,
हृदय राखि कोसलपुरा राजा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यात्रा शुभ, सफल और कष्टमुक्त हो, इसके लिए मानस की उक्त चौपाई कार्य से पहले उच्चारित करते हैं। सुंदरकांड की यह चौपाई हनुमान जी के लंका में प्रवेश करने के वक्त की है। हरीश रावत जी...प्रभु आपको भी हनुमान जी की तरह सफल करें, आप भी हनुमान जी की तरह अलंघनीय पर्वतों-सी तमाम बाधाओं को पार कर सकें और मूर्छित पड़े सरकारी सिस्टम को संजीवनी खोजकर, सुंघाकर उसे होशमंद करें......शुभकामनाएं