फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विरासत का समापन, आखिरी शाम रही कव्वाली के नाम

Sat, 02 Nov 2013 10:57 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
विज्ञापन
राजधानी देहरादून में विरासत महोत्सव की आखिरी शाम कव्वाली और सूफियाना संगीत की सुरीली धुनों पर स्रोता झूमते रहे। सीमा पार से आए दो संगीतज्ञों ने समय और सीमाओं की बाधाओं को परे छोड़कर संगीत ऐसी खनन छेड़ी कि दो दिन से खाली-खाली सा रहने वाला पंडाल पूरी तरह भरा रहा।
विज्ञापन


कव्वाली में खोए रहे
सूफी संगीत के बाद देर रात तक लोग कव्वाली के रंग में खोए रहे। अंबेडकर स्टेडियम कौलगढ़ में शुक्रवार को विरासत की शाम की शुरुआत सूफी गायन के साथ हुई। पाक पट्टन प्रदेश के संगीतज्ञ वाहदत रमीज और हसनेन जावेद ने सूफियाना कलाम गजल और ठुमरी के साथ कार्यक्रम शुरू किया।

स्रोता झूम उठे
दिल ए दी लुट्टी तेयां यार सजन..के गायन के साथ ही स्रोता झूम उठे। इसके बाद उन्होने बुल्ले शाह का तेरे इश्क नचाया कर थैया थैया..,इकबाल बानो की गज़ल पायल में गीत है छम छम...गाकर शमां बांध दिया।
विज्ञापन


उनके साथ तबले पर रियाज अहमद, की-बोर्ड पर अताह उल्लाह और हारमोनियम पर स्वयं हसनेन जावेद थे। इसके बाद इंडियन ओशियाना बैंड के संस्थापक सुषमित सेन ने गिटार पर सिंग, हक, नेपच्यून डांस आदि की प्रस्तुति दी।

आखिरी शाम की अंतिम प्रस्तुति थी कव्वाली। महान कव्वाली गायक नुसरत फतेह अली खान साहब के शिष्य अट्टा भाग काले खान और उनके साथियों  ने शायरी के साथ कव्वाली की प्रस्तुति देकर स्रोताओं को पंडाल में वापस खींच लिया। इस दौरान सूफी गायक वाहदत रमीज़ और हसनेन जावेद ने उनका साथ दिया।

झूमने पर मजबूर कर दिया
उन्होंने सबसे पहले महफिल में बार-बार उसी पर नजर गई, हमने बचाई लाख मगर फिर उधर गई...की प्रस्तुति के साथ दर्शकों को तालियां बचाने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद उसकी नजरों से अल्लाह बचाए..., बुल्ले शाह का नी मैं जाणा जोगी दे नाल... आदि कव्वालियों की प्रस्तुति देकर स्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया। वहीं अंतिम शाम नागामंडल डांस और कथक नृत्य की प्रस्तुति नहीं हो सकी।
विज्ञापन

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें