विधेयक में ये की गई है व्यवस्था
राज्य आंदोलनकारियों के सभी पात्र आश्रितों को आरक्षण का लाभ मिलेगा।
2004 से क्षैतिज आरक्षण के माध्यम से सरकारी सेवा में शामिल हो चुके आंदोलनकारियों की सेवाओं को वैधता प्रदान करेगा।
चिह्नित आंदोलनकारियों की पत्नी या पति, पुत्र एवं पुत्री के साथ ही विवाहिता, विधवा, पति द्वारा परित्यक्त, तलाकशुदा पुत्री को इसमें शामिल किया गया है।
विधेयक को मंजूरी मिली तो 13,000 को मिलेगा लाभ
राज्य में चिह्नितराज्य आंदोलनकारियों की संख्या करीब 13000 है। विधेयक को राजभवन से मंजूरी मिलती तो आरक्षण का लाभ इन हजारों राज्य आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों को मिलता।
कब क्या हुआ
2004 में एनडी तिवारी सरकार में राज्य आंदोलनकारियों को नौकरी में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का शासनादेश हुआ।
इस शासनादेश के आधार पर करीब 1,700 आंदोलनकारी सरकारी नौकरी में लगे।
वर्ष 2016 में हरीश रावत सरकार में आरक्षण को कानूनी रूप देने के लिए मंत्रिमंडल ने विधेयक पास कर राजभवन भेजा।
लगभग छह साल से भी अधिक समय तक विधेयक राजभवन में लंबित रहा।
वर्ष 2021 में सीएम धामी ने अपने पहले कार्यकाल में कैबिनेट से प्रस्ताव पास कर राजभवन को आरक्षण के मसले से अवगत कराया।
वर्ष 2023 में राजभवन से विधेयक कुछ आपत्ति के साथ वापस भेजा गया।
इस साल धामी सरकार ने विधेयक को कुछ संशोधनों के साथ फिर से राजभवन भेजा।
राज्यपाल इन दिनों नैनीताल में हैं, जबकि इससे पहले राज्य में चुनाव थे। आरक्षण के मसले को पूर्व में हाईकोर्ट से रद्द किया जा चुका है। इसमें यह देखना होगा इसे फिर से उसी आधार पर तो नहीं भेजा गया है या इसमें कोई बदलाव किया गया है। -रविनाथ रामन, सचिव राज्यपाल
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राज्य आंदोलनकारियों को क्षैतिज आरक्षण विधेयक के मसले पर राज्यपाल के सचिव से बात की जाएगी। राज्य में अब तक चुनाव आचार संहिता लगी हुई थी जो अब खत्म हो चुकी है। अब राजभवन से इस मसले पर वार्ता की जाएगी। - दिलीप जावलकर, सचिव, गृह
विस से पारित विधेयक को राजभवन में इतने अधिक समय तक रोके रखना असांवधानिक और अनैतिक है। राजभवन या इसे अनुमोदित करे या लौटा दे। पिछले 13 साल से आंदोलनकारियों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है। इस बीच एक लाख सरकारी नौकरियों निकल चुकी हैं। -रविंद्र जुगरान, वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी