उर्मिल के रिश्तेदार रिटायर्ड बीडीओ कमल किशोर थपलियाल ने बताया कि उर्मिल के जन्म के कुछ साल बाद उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। पिता के भी स्वर्गवास होने के बाद उनकी बुआ अपने साथ फालतू लाइन देहरादून ले गईं। वहां उनकी पढ़ाई लिखाई हुई। यहां चुक्खूवाला में वे रामलीला में अभिनय करने लगे। यहीं से उनका आकाशवाणी में जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
आकाशवाणी में सेवा के दौरान उनके नजदीकी सेवानिवृत्त आकाशवाणी अधिकारी पार्थसारथी थपलियाल बताते हैं कि लखनऊ जाकर उर्मिल रंगमंच से जुड़ गए। उत्तर प्रदेश की प्रमुख नाट्य विद्या नौटंकी को नया रूप देने और लोकप्रिय बनाने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा।
वे अपने नाटकों और नौटंकी के कारण विश्वविख्यात थे। वे हिंदी, अवधी और गढ़वाली नाटकों के लिए विशेष रूप से जाने जाते थे। डा. उर्मिल ने अनेक नाटक लिखे। उनकी लिखी नौटंकी ‘हरिश चन्नर की लड़ाई’ देश में विभिन्न स्थानों पर मंचित हुई।
साहित्यकार व व्यंगकार डा. उर्मिल कुमार थपलियाल के देहावसान पर प्रो. उमा मैठाणी, प्रो. डीआर पुरोहित, महेश गिरि, आरती पुंडीर, जयकृष्ण पैन्यूली, नीरज नैथानी, कमल रावत, देवेंद्र उनियाल और मदन मोहन उंगवाल आदि ने शोक जताया है।