कुंडियाड़ गांव के आसपास करीब तीन से चार किमी क्षेत्र में आटा चक्की नहीं है। पहले भी गांव से करीब पांच किमी दूर घराट होते थे। ऊंचाई पर होने की वजह से यहां गदेरे से घराट चलाने का विकल्प भी नहीं था। इसको देखते हुए पूर्वजों ने तालाब से 200 मीटर कच्ची गूल का निर्माण कर घराट लगवाया। आज भी बारिश के पानी से यह घराट चल रहा है। पूरे गांव के लोग इसी घराट पर गेहूं की पिसाई करते हैं। घराट से निकलने के बाद पानी बेकार नहीं जाता। इसे गूल के जरिये खेतों तक पहुंचाने की भी व्यवस्था है।
तालाब के पानी से प्राकृतिक जल स्रोत भी हो रहे है रिचार्ज
पहाड़ की चोटी पर खोदे गए तालाब के पानी और घने जंगल से तलहटी के प्राकृतिक जल स्रोत भी रिचार्ज हो रहे हैं। इससे ढुंडसिर गदेरे के दर्जनों गांवों के किसानों को सिंचाई और पीने के लिए 12 माह पर्याप्त पानी मिल रहा है। जबकि तालाब के पानी से जंगली जानवर भी अपनी प्यास बुझाते हैं।
वन अधिनियम बन रहा बाधा
कुंडियाड़ गांव के तालाब और गूलों के पक्का न होने से तालाब में गाद जमा होने लगी है। इससे तालाब की गहराई अब डेढ़ मीटर तक रह गई है। तालाब से रिसाव भी होने लगा है। जिस कारण ग्रामीण अब तालाब और उससे निकलने वाली सिंचाई गूलों के पक्कीकरण की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं।
तालाब से गाद हटाने व अन्य निर्माण के लिए वन विभाग की अनुमति जरूरी है। यह कार्य वन विभाग की देखरेख में किए जा सकते हैं। लेकिन पक्के निर्माण के लिए पहले वन भूमि ट्रांसफर करनी होगी।
-डीएस पुंडीर, रेंजर, माणिक नाथ रेंज, कीर्तिनगर