बीएसआई के विश्लेषण के अनुसार यह आर्किड की एक लुप्तप्राय प्रजाति है। पिछले साल भी इसी टीम को चमोली जिले में 3800 मीटर की ऊंचाई पर आर्किड लिपारिस पिग्निया की एक दुर्लभ प्रजाति मिली थी, जिसे भारत में 124 साल बाद देखा गया था और पश्चिमी हिमालय में पहली बार देखा गया था।
बता दें कि हाल ही में चमोली जिले के मंडल क्षेत्र में उत्तराखंड वन विभाग के अनुसंधान विंग की ओर से एक आर्किड संरक्षण केंद्र भी स्थापित किया गया है, जहां आर्किड की 70 विभिन्न प्रजातियों को संरक्षित किया गया है।
चतुर्वेदी ने बताया कि उत्तराखंड आर्किड प्रजातियों के मामले में बेहद समृद्ध है। यहां चमोली के मंडल क्षेत्र के आलवा पिथौरागढ़ की गौरी घाटी दो ऐसे स्थान हैं, जो आर्किड प्रजातियों के लिए बेहद मुफीद वातावरण तैयार करते हैं।
लुप्तप्राय आर्किड प्रजाति सेफालंथेरा इरेक्टा वर मंडल क्षेत्र में बांज के जंगलों के बीच पाया गया है, जिसका पौधा छह से सात इंच का है। इसमें सफेद फूल खिलता है। फ्लावरिंग सीजन में ही इस पौधे की पहचान संभव है। शोध दल को यह पौधा बेहद सीमित संख्या में मिला है। इसीलिए इसे दुर्लभ प्रजाति में शामिल किया गया है।