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उत्तराखंड: चुनाव से पहले गर्माया भू-कानून और और चकबंदी का मुद्दा, हिमाचल की तर्ज पर लागू हो कानून

Sat, 03 Jul 2021 05:27 PM IST
अलका त्यागी विनोद मुसान, अमर उजाला, देहरादून

सार

कई सामाजिक संगठन इसे चुनावी मुद्दा बनाने की मांग कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि हिमाचल की तर्ज पर उत्तराखंड में भी सशक्त भू-कानून बने, ताकि राज्य में बाहरी लोग जमीन न खरीद सकें।
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खेती(प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : पिक्साबे
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विस्तार
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उत्तराखंड में विधान चुनाव 2022 से ठीक पहले राज्य में भू-कानून और चकबंदी के मुद्दे एक बार फिर जोर पकड़ने लगे हैं। सोशल मीडिया पर भी ये मुद्दा गर्माया हुआ। अमर उजाला ने इस मुहिम में जुटे लोगों से बातचीत की...

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जब दूसरे हिमालयी राज्यों में कानून हैं, फिर उत्तराखंड में क्यों नहीं? मैखुरी 
वर्ष 2018 में उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950 में जब संशोधन किया गया तब केदारनाथ के विधायक मनोज रावत ही एकमात्र विधायक थे, जिन्होंने इसका विरोध किया था। इसे पहाड़ में जमीनों की खुली लूट करने वाला विधेयक करार दिया था। पड़ोसी राज्य हिमाचल में कानूनी प्रावधानों के चलते कृषि भूमि की खरीद लगभग नामुमकिन है। सिक्किम में भी भूमि की बेरोकटोक बिक्री पर रोक के लिए बीते वर्ष ही कानून बना है। मेघालय का कानून भी भूमि बिक्री पर पाबंदी लगाता है। जब दूसरे हिमालयी राज्यों में कानून हैं तो फिर उत्तराखंड में क्यों नहीं? राज्य में एक सशक्त कानून लाना चाहिए। 
- इंद्रेश मैखुरी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं गढ़वाल सचिव, भाकपा (माले) 

हिमाचल और पूर्वोत्तर के राज्यों की तरह यहां भी लागू हो कानून : असवाल  
पहाड़ में भूमि खरीदने के लिए बाहरी राज्यों के बाशिंदों की बाढ़ सी आ गई। दूरदराज गांवों में भी बाहरी प्रदेश के लोगों की ओर से जमीनें खरीदने के प्रयास किए जा रहे हैं। जो पहाड़ के सामाजिक ताने बाने, संस्कृति व बोली-भाषा के लिए खतरे का कारण बन सकता है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी प्रभावित होने का अंदेशा है। 250 वर्ग मीटर भूमि खरीदने के नियम के बावजूद एक ही परिवार के दो या दो से अधिक सदस्यों के नाम से बड़ी जमीनें बेची व खरीदी जा रही हैं। अब समय आ गया है कि उत्तराखंड में भी हिमाचल अथवा पूर्वोत्तर के राज्यों की भांति कृषि भूमि की खरीद फरोख्त के कड़े नियम लागू किए जाएं।  
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- रतन सिंह असवाल, संयोजक, पलायन एक चिंतन

प्रदेश में अनिवार्य चकबंदी कानून की जरूरत : डोभाल
प्रदेश में आंशिक और स्वैच्छिक चकबंदी को कानूनी रूप में मान्य किया गया है। जबकि हम इसे अनिवार्य बनाने की मांग कर रहे हैं। अभी तक राज्य में मात्र पौड़ी गढ़वाल के तीन गांवों में चकबंदी का नोटिफिकेशन हुआ है। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का गांव खैरा, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गांव पंचूर और कृषि मंत्री सुबोध उनियाल का पैतृक गांव औणी शामिल है। 21 मई 2020 को चकबंदी नियमावली राज्य कैबिनेट में पास एवं विधायी द्वारा परीक्षण के बाद राजस्व विभाग द्वारा नियमावली का प्रकाशन किया जा चुका है। पहाड़ की जमीनों को बचाना है कि तो यहां अनिवार्य रूप से चकबंदी कानून लागू करना पड़ेगा। 
- कपिल डोभाल, संयोजक, गरीब क्रांति अभियान, उत्तराखंड

सत्ता में आते ही पहला काम भू-कानून लागू करने का काम करेंगे : रावत 
वर्ष 2022 में अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो हम पहले वर्ष में हिमाचल प्रदेश के भू-कानून से भी बेहतर कानून बनाकर राज्य में लागू करेंगे। लोग आज चकबंदी की बात तो करते हैं, लेकिन मगर भू-कानून पर व्यापक चर्चा करने से बचते हैं। हमने 2016 मेें पर्वतीय चकबंदी का कानून बनाया। लेकिन इन्हें लागू नहीं किया जा सका। मैं जनभावना के अनुरूप इस कानून का समर्थन करता हूं। भू कानून और चकबंदी दोनों राज्य के हित में है। लेकिन भाजपा ने इसमें संशोधन करने के पूंजीपतियों के लिए राज्य में जमीन खरीद-फरोख्त का रास्ता खोल दिया। हमारी सरकार आती है तो हम राज्य में भू-पैमाइश करवाएंगे और चकबंदी का कानून भी लागू करवाएंगे। 
- हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखंड 

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उत्तराखंड में लागू भू-कानून की स्थिति पर एक नजर 

उत्तराखंड बनने के बाद राज्य में उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950 लागू किया गया। इसके बाद यहां इस कानून में समय-समय पर संशोधन हुए। उत्तराखंड में वर्ष 2002 में बाहरी व्यक्तियों के लिए भूमि खरीद की सीमा 500 वर्ग मीटर की गई। वर्ष 2007 में यह सीमा 250 वर्ग मीटर कर दी गई। लेकिन इसके बाद वर्ष 2018 में उत्तराखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम,1950 में संशोधन का विधेयक पारित करवाया गया।

इस संशोधन के तहत विधेयक में धारा 143 (क) जोड़ कर यह प्रावधान किया गया कि औद्योगिक प्रयोजन के लिए भूमिधर स्वयं भूमि बेचे या फिर उससे कोई भूमि क्रय करे तो इस भूमि को अकृषि करवाने के लिए अलग से कोई प्रक्रिया नहीं अपनानी पड़ेगी। औद्योगिक प्रयोजन के लिए खरीदे जाने पर उसका भू उपयोग स्वत: बादल जाएगा और वह-अकृषि या गैर कृषि हो जाएगा। इसके साथ ही उक्त अधिनियम में धारा 154 (2) जोड़ी गई। इससे पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि खरीद की सीमा को औद्योगिक प्रयोजन के लिए पूरी तरह खत्म कर दिया गया। बाहरी लोगों ने राज्य में निवेश के नाम पर बेतहाशा जमीनें खरीद डालीं, लेकिन इन जमीनों पर आज तक उद्योगों की फसल खड़ी नहीं हुई।

उतराखंड में हिमाचल की तरह लागू हो भू कानून : हेमंत
फिल्म अभिनेता हेमंत पांडे ने उतराखंड में हिमाचल की तरह भू-कानून लागू करने की वकालत की है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते भू-कानून लागू नहीं किया गया तो भविष्य में उतराखंड की स्थिति भी कश्मीर की तरह हो जाएगी। उन्होंने उतराखंड के युवाओं का आह्वान किया है कि वे राज्य में भू-कानून लागू करने के लिए दलगत राजनीति से हटकर और एकजुट होकर आवाज उठाएं।

फिल्म अभिनेता पांडे ने  शुक्रवार को मुंबई से सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी किया। 4:15 मिनट के वीडियो में उन्होंने कहा कि राज्य के लिए भू-कानून बहुत जरूरी है। यदि ऐसा न हुआ तो आने वाली पीढ़ी के पास केवल उतराखंड का नाम ही रह जाएगा। उन्होंने कहा कि देश में पैसे वालों की कोई कमी नहीं है। वे चाहें तो देश, उतराखंड और यहां के नेताओं को भी खरीद सकते हैं। ऐसे में जरूरत है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको जगाए और भू-कानून का समर्थन करते हुए सरकार को इस कानून को लागू करने के लिए मजबूर करे।

 पांडे ने कहा कि एक नई आजादी का आंदोलन हमें शुरू करना होगा और यह आंदोलन हमें अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए करना होगा। ऐसा नहीं है कि कोई बाहर का व्यक्ति यहां नहीं आए बल्कि आए ठीक वैसे ही जैसे हिमाचल में जाता है। हिमाचल की तर्ज पर ही यहां भूमि खरीद-फरोख्त के नियम-कानून बनें तभी यहां की जमीनें बच पाएंगी। उन्होंने कहा कि यहां के कुछ लोगों के साथ मिलकर पहाड़ के पहाड़ खरीदे जा रहे हैं। ऐसा ही चलता रहा तो उतराखंड का भविष्य भयंकर होने वाला है। पांडे का कहना है कि जब जनता सांसद और विधायक बना सकती है तो वह उतराखंड में भू-कानून लाने के लिए सरकार को बाध्य भी कर सकती है।
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