हत्या के मामले में सजा पर हुई सुनवाई के बाद न्यायालय ने अपने निर्णय में धारा 357 ए के तहत राज्य सरकार को पीड़ित योजना के तहत मृतका के परिजनों को प्रतिकर धनराशि देने की भी संस्तुति की है। न्यायालय ने इस संबंध में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को भी जरूरी कार्यवाही करने के निर्देश दिए हैं।
राज्य बनने बाद चार मामलों में नौ को हो चुकी है फांसी की सजा
जिला शासकीय अधिवक्ता फौजदारी सुशील कुमार शर्मा ने बताया कि उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से अब तकजिला न्यायालय से चार अलग-अलग मामलों में नौ अभियुक्तों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है।
किसे कब सुनाई गई फांसी की सजा
- नौ मई 2002 को तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश पीसी पंत की अदालत ने हल्द्वानी के एक मामले में धारा 302, 148, 149 व 28 आर्म एक्ट के मामले में राजेश शर्मा और नवीन शर्मा को।
- 28 जून 2004 को तत्कालीन अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश जीके शर्मा की अदालत ने धारा भारतीय दंड संहिता की 376, 377, 302, 201-34 के तहत अभियुक्त बाबू, आमिर, पवन और अर्जुन को।
- सात जनवरी 2004 को तत्कालीन अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश जीके शर्मा की अदालत ने ही बाजपुर के मामले में धारा 376, 302 व 201-34 के तहत आफताब व मुमताज को।
- 28 फरवरी 2014 को तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश मीना तिवारी की अदालत ने लालकुआं में हुए संजना हत्याकांड में धारा 363, 376, 302, 201-34 के तहत दीपक आर्या को।
न्यायाधीश प्रीतू शर्मा ने अपने आदेश में कहा है कि अभियुक्त ने अपनी मां की गर्दन को धड़ से अलग कर बर्बरतापूर्वक तरीके से हत्या की है। घटना के समय मृतका असहाय थी। दोष सिद्ध मृतका का सगा पुत्र है, उसका मृतका के साथ विश्वास का रिश्ता था। यह अपराध इतनी क्रूरता के साथ किया गया जिससे न केवल न्यायिक विवेक अपितु सामाजिक विवेक को भी झकझोर दिया है।
इस मामले में दोष सिद्ध में सुधार होने और उसका पुनर्वास करने पर उसके द्वारा दोबारा ऐसा अपराध करने की संभावना न हो, ऐसी भी परिस्थितियां इस केस में नहीं हैं। ऐसे में दोष सिद्ध में उदारता कारक कोई भी तथ्य प्रकट नहीं हो रहा है।
दोष सिद्ध ने अपनी माता की नृशंस हत्या की है जबकि मां का स्थान सामाजिक मान्यता के अनुसार पृथ्वी पर ईश्वर के समान माना जाता है और माता द्वारा अपने पुत्र के पालन पोषण में किए गए श्रम का कोई विकल्प नहीं हो सकता है। इस अपराध का प्रभाव समाज पर पड़ना स्वाभाविक है। इस प्रकार यह मामला दुर्लभ से दुर्लभतम अपराध की श्रेणी में आता है।