राज्य गठन के बाद उत्तराखंड में भाजपा की अंतरिम सरकार बनी। ये क्षेत्रीय राजनीति के लिए संक्रमणकाल का दौर था। यही वह समय था जब राज्य की जनता को तय करना था कि वह क्षेत्रीय दलों के साथ जाए या राष्ट्रीय दलों का साथ दे। लेकिन पहाड़ की कुछ इलाकों का मत स्पष्ट था। लिहाजा नए राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में यूकेडी ने चार सीटें जीतकर उपस्थिति दर्ज कराई। लेकिन चौके से सियासी पारी का आगाज करने वाली यूकेडी चौथे चुनाव तक शून्य पर विधानसभा से आउट हो गई।
क्षेत्रीय दल भी नहीं बन पाया विकल्प
भाजपा और कांग्रेस के दबदबे और यूकेडी की आपसी लड़ाई के चलते राज्य में उत्तराखंड रक्षा मोर्चा का उदय हुआ। उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी, उत्तराखंड जनवादी पार्टी ने चुनाव में भाग्य अजमाया। यूकेडी के विकल्प के तौर पर रक्षा मोर्चा ने भी चुनाव में ताल भी ठोकी। लेकिन इन सबके हाथ कुछ हाथ नहीं लगा। जनता ने इस क्षेत्रीय दल को दरकिनार कर दिया। दल के शीर्ष नेता पूर्व सांसद टीपीएस ने दल को आप में विलय कर दिया। इस बीच उक्रांद भी दो हिस्सों में बंट गया।
चुनाव दर चुनाव हांफता गया बसपा का हाथी
राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में क्षेत्रीय दल के तौर पर बहुजन समाज पार्टी(बसपा) ने सात सीटें जीतकर शानदार प्रदर्शन किया। लेकिन चुनाव दर दर चुनाव उसकी स्थिति खराब होती गई और राष्ट्रीय दलों की सियासी चालों के आगे बसपा का हाथी हांफने लगा। हालांकि उसका प्रदर्शन हरिद्वार जिले तक सीमित रहा। वर्ष 2017 के विस चुनाव में बसपा खाता तक नहीं खोल पाई। सपा की तो पहले चुनाव से ही खराब स्थिति रही।