प्रदेश के कई पर्वतीय जिलों में कोटी बनाल शैली बेहद प्रचलित रही है। इस शैली से लकड़ी के पांच मंजिला भवन तक तैयार किए जाते हैं। इस शैली से बने भवन कई भूकंपों को झेलने में भी सक्षम साबित हुए हैं। विशेषज्ञों के पास स्थान का चयन, मिट्टी और लकड़ी का चुनाव करने की व्यापक तकनीकी होती थी जो कि अब धीरे-धीरे गायब होती जा रही है। इस वजह से यह शैली भी खतरे में आने लगी है।
आज तक नहीं है विकास का कोई ठोस मॉडल
पहाड़ में वैसे तो हमेशा निर्माण कार्यों में परंपराओं से लेकर तमाम तरह की बातें होती आई हैं लेकिन पर्यावरण एवं जन सुरक्षा के तहत आज तक निर्माण का कोई ठोस मॉडल नहीं बन पाया है। इसके चलते बेलौस निर्माण ने पहाड़ को बदरंग बनाने के साथ ही जीवन और खतरनाक बना दिया है।
जांच और तकनीक होना चाहिए निर्माण का आधार
पहाड़ में जो भी निर्माण होता है, ज्यादातर ढलान पर होता है। जो भी ऐसा निर्माण हो, उसकी पहले भूगर्भीय जांच जरूरी है। तभी वह स्थायी होगा। पहाड़ों में अभी तक कंक्रीट के इस्तेमाल को लेकर भी कोई गंभीरता नहीं है। किस परिस्थति में किस गुणवत्ता के कंक्रीट का इस्तेमाल होना चाहिए, इस ओर सोचने की जरूरत है। खासतौर से उन इलाकों के निर्माण में, जहां बादल फटने जैसी घटनाएं होती आई हैं। इसी तरह पहाड़ में निर्माण के लिए सीसमिक जोन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। निजी या सरकारी जो भी निर्माण हो, उसे भूकंपरोधी बनाने पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। नदियों के किनारे निर्माण को रोकने की जरूरत है क्योंकि नदियों के किनारे हमेशा अस्थायी होते हैं, कभी भी ढह सकते हैं। कुल मिलाकर आज की तकनीकी के हिसाब से पहाड़ में निर्माण की ठोस नीति बनाने की जरूरत है।
-डॉ. एके बियानी, जियोलॉजी एक्सपर्ट