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बजट समीक्षा : ग्रीन बोनस की मांग को प्रभावी ढंग से नहीं उठा पा रहा उत्तराखंड 

Wed, 02 Feb 2022 05:44 AM IST
दुष्यंत शर्मा विनोद मुसान, देहरादून

सार

पर्यावरणविद बोले, आज नहीं तो कल, पर्यावरणीय सेवाओं का मूल्य चुकाना ही होगा।
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हिमालय की पहाड़ियां - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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केंद्रीय बजट में उत्तराखंड के ग्रीन बोनस की मांग फिर दरकिनार की गई है। पर्यावरणविद् पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी का मानना है कि राज्य ग्रीन बोनस की मांग को केंद्र के सामने ठीक प्रकार से प्रस्तुत नहीं कर पा रहा है। निश्चित तौर पर आज नहीं तो कल केंद्र को राज्य की पर्यावरणीय सेवाओं का मूल्यांकन करना ही होगा। 

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डबल इंजन की सरकार और विधानसभा चुनाव काल में ग्रीन बोनस की मांग पूरी हो सकती है, लेकिन राज्य को निराशा ही हाथ लगी। उत्तराखंड में पिछले कई वर्षों से पर्यावरणीय सेवाओं के बदले ग्रीन बोनस की मांग की जा रही है। प्रदेश का का कुल 71 प्रतिशत भूभाग वन क्षेत्र है। जबकि पर्वतीय जिलों में 90 से 95 प्रतिशत भूभाग वनों से घिरा है। उत्तराखंड के विकास की रफ्तार पर पर्यावरणीय एवं वन संरक्षण से जुड़ी बंदिशों की लगाम है। जिससे राज्य के विकास से जुड़ी तमाम परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ पाती हैं। केंद्रीय बजट में राज्य की ग्रीन बोनस की मांग यदि पूरी होती तो राज्य में प्राकृतिक संपदा आधारित उद्योगों को बढ़ावा मिलता। 

उत्तराखंड को चुकानी पड़ रही विकास की कीमत 
उत्तराखंड को विकास की बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। पिछले साल राज्य सरकार की ओर से पर्यावरणीय सेवाओं के मूल्यांकन के लिए किए गए अध्ययन के बाद जो बातें सामने आईं थीं, वह चौंकाने वाली हैं। अध्ययन के जरिए 21 पर्यावरणीय सेवाओं का मूल्य निकाला गया। नियोजन विभाग की ओर से कराए गए अध्ययन में राज्य में पर्यावरणीय सेवाओं का सकल मूल्य 95 हजार करोड़ रुपये सालाना आंका गया। यह राज्य की जीडीपी का करीब 43 प्रतिशत है। वन क्षेत्र का शेयर मूल्य करीब 15 लाख करोड़ रुपये आंका गया है। जो जीडीपी का साढ़े छह गुना है। इन सबके बदले उत्तराखंड केंद्र सरकार से ग्रीन बोनस के रूप में करीब सात हजार करोड़ रुपये सालाना मांग रहा है। 
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निश्चित तौर पर उत्तराखंड को पर्यावरणीय सेवाओं का लाभ मिलना चाहिए। उत्तराखंड सरकार की यह मांग पुरानी है। मुझे लगता है कि राज्य सरकार सही तरीके से ग्रीन बोनस के प्रपोजल को प्रस्तुत नहीं कर पा रही है। केंद्र सरकार को समझना होगा कि उत्तराखंड का पर्यावरणीय सेवाओं के रूप में कितना महत्वपूर्ण योगदान है। यदि उत्तराखंड की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचता है तो पूरे देश के लिए खतरा होगा। इसलिए जरूरी है कि केंद्र राज्य को ग्रीन बोनस के रूप में आर्थिक रूप से मदद करे। 
-पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, पर्यावरणविद

हिमालयी घाटियों विशेषकर गंगा के क्षेत्र में वन एवं पर्यावरण संरक्षण की नीति के अंतर्गत ग्रीन बोनस का प्रावधान होना चाहिए था, जिसका सीधा लाभ रसोई गैस, केरोसिन, पेट्रोल-डीजल, बिजली में विशेष सब्सिडी के रूप में पहाड़ निवासियों को मिलता। इससे विशेष रूप से हिमालयी ईको सेंसिटिव जोन की ग्राम पंचायतों को लाभ मिलता। यह कदम पर्यावरण संरक्षण के लिए जनमानस को प्रेरित कर सकारात्मक संदेश भी देता। ऐसा कोई प्रावधान अभी तक नहीं किया जाना खेदजनक है। 
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 डॉ. हेमंत ध्यानी, पर्यावरणविद

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