‘सीएम साहब, वर्ष 2001 में आरक्षण की नीति तय करते समय रैपिड सर्वे के आधार पर अनुसूचित जाति की आबादी 18 फीसदी के स्थान पर 19 प्रतिशत मान ली गई। सीधी भर्ती के पदों में पहला पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने पर पांचवें पद तक आरक्षण 20 प्रतिशत तक हो गया। क्या ये संवैधानिक रूप से उचित था?’ यह प्रश्न बृहस्पतिवार को उत्तराखंड जनरल ओबीसी इम्प्लाइज फेडरेशन के नेताओं ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के समक्ष उठाया। उन्होंने मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन भी सौंपा, जिसमें कैबिनेट में आरक्षण के रोस्टर के संबंध में लिए गए फैसले का शासनादेश जारी करने का अनुरोध किया गया। ज्ञापन में एससी कर्मचारी को सीधी भर्ती के पद का लाभ छठवें पद से देने और उसको 18 प्रतिशत तक की सीमा में करने की भी मांग भी की गई।
फेडरेशन के इस प्रतिनिधिमंडल में प्रदेश महासचिव वीरेंद्र सिंह गुसांई, बीपी नौटियाल, राकेश जोशी, एसपीएस देवड़ा, राजेंद्र सिंह चौहान, सुभाष देवलियाल, सीएल असवाल, अनिल उनियाल, रीता कौल, संदीप चमोला और हीरा सिंह बसेड़ा शामिल थे। उन्होंने सीएम को बताया कि 18 जुलाई 2001 को कार्मिक विभाग ने राज्याधीन सेवाओं, शिक्षण संस्थानों, निगमों में आरक्षण नीति निर्धारित करने के लिए जनसंख्या के रैपिड सर्वे आंकड़ों के आधार पर आरक्षित श्रेणी की सकल जनसंख्या में उनके प्रतिशत से एक प्रतिशत अधिक आरक्षण देने का निर्णय लिया। इस हिसाब से एससी का 19, एसटी का 04 और ओबीसी का 14 प्रतिशत आरक्षण तय हुआ। कार्मिक विभाग ने जो सीधी भर्ती के पदों के लिए जो रोस्टर तय किया, उसमें एससी के लिए पहला पद तय किया गया।
यानी कुल 100 पदों में उनके 20 प्रतिशत पद हो गए, जबकि उसके लिए आरक्षण 19 प्रतिशत निर्धारित है। रैपिड सर्वे के आधार पर 18 प्रतिशत आबादी के स्थान पर आरक्षण को 19 प्रतिशत करना व्यावहारिक नहीं था। उस पर रोस्टर में पहला पद आरक्षित होने से आरक्षण की व्यवस्था 20 फीसदी हो गई, जो संवैधानिक रूप से उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि रोस्टर में पहले पद पर आरक्षण देने से इसकी दर 50 प्रतिशत तक और पांचवें पद तक ये 20 प्रतिशत से अधिक पहुंच रही है। इसीलिए डीओपीटी के मानकों के आधार पर हिमाचल राज्य की भांति उत्तराखंड राज्य में कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य की अध्यक्षता में गठित उप समिति ने रोस्टर की त्रुटि में सुधार किया। उन्होंने आशंका जाहिर की कि एससी एसटी फेडरेशन द्वारा कैबिनेट का निर्णय रोके जाने का दबाव बनाया जा रहा है और यूपी का आरक्षण रोस्टर बरकरार रखने का अनुरोध किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार इस पुनर्विचार करती है, तो वह यूपी द्वारा आरक्षण के संबंध में जितने भी फैसले लिए गए हैं, उनको राज्य में तत्काल लागू करे।
धर्म संकट में सरकार
सीधी भर्ती के पदों में आरक्षण के रोस्टर के मामले में प्रदेश सरकार अजीब दुविधा में फंस गई है। प्रदेश मंत्रिमंडल की बैठक में कैबिनेट की उपसमिति की सिफारिश पर सरकार आरक्षण रोस्टर का निर्धारण कर चुकी है। फैसले के अनुसार, रोस्टर में एससी का पद पहले स्थान से छठे स्थान पर किया गया है। इस पर अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति से जुड़े कर्मचारियों को एतराज है। उनकी मांग पर कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कैबिनेट के फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग कर चुके हैं। जवाब में जनरल और ओबीसी इम्प्लाइज फेडरेशन ने उपसमिति के सदस्य कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल का दरवाजा खटखटाकर कैबिनेट का फैसला न बदलने और फैसले का तत्काल शासनादेश जारी करने की मांग उठाई। इसके बाद भाजपा विधायक देशराज कर्णवाल के नेतृत्व में एससी-एसटी इम्प्लाइज फेडरेशन ने बुधवार को मुख्यमंत्री के दफ्तर में दस्तक दी। जवाब में आज जनरल ओबीसी इम्प्लाइज फेडरेशन ने भी मुख्यमंत्री से मुलाकात कर शासनादेश जारी करने की मांग उठा दी। अब सरकार आरक्षित और गैर आरक्षित कर्मचारियों की यूनियनों की मांग के बीच फंस चुकी है।