शहरों की हालत काफी खराब हो गई। देहरादून इसका उदाहरण है। यहां ट्रैफिक की दुर्व्यवस्था सबके सामने हैं, लेकिन इसके लिए किसी एक विभाग को हम जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। दरअसल, हमें इसके लिए दीर्घकालीन योजना बनानी होगी। आने वाले वर्षों में हमारी सबसे बड़ी चुनौती शहरीकरण की होगी। कैसे हम शहरों को रहने लायक बना सकेंगे, यह सिर्फ कागजों में नहीं जमीन पर दिखना चाहिए। स्मार्ट सिटी तो दूर की बात है कि पहले हमें अपने शहरों को रहने लायक बनाना होगा।
चिकित्सा और शिक्षा हमारे सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। राज्य का आम आदमी इन दोनों क्षेत्रों के लिए सरकारी तंत्र पर निर्भर हैं। उसे निजी क्षेत्र पर नहीं छोड़ सकते हैं। निसंदेह हम चिकित्सा और शिक्षा पर बहुत अधिक खर्च कर रहे, लेकिन क्या इससे राज्य के लोगों की सामाजिक जरूरतें पूरी हो पा रही हैं?
सरकार को सामाजिक क्षेत्र को लेकर गंभीरता से विचार करना होगा। इसके लिए अलग रणनीति बनानी होगी। मेडिकल कॉलेज खोल देने से कुछ होने वाला नहीं है। यदि इनमें व्यवस्थाएं दुरुस्त नहीं होती हैं तो इसका राजनीतिक लाभ भी नहीं मिलता है। राज्य में अब नीति आयोग बन रहा है। पॉलिसी प्लानिंग बहुत ही महत्वपूर्ण चीज है। प्रभावी रणनीति बनानी होगी, जो स्थानीय परिस्थिति के अनुरूप हो।
हमें अलग से यह भी सोचना होगा कि देहरादून, श्रीनगर गढ़वाल और अल्मोड़ा की जरूरतें और परिस्थितियां भिन्न हैं। सभी पर एक मॉडल लागू नहीं हो सकता। मैं पलायन के पक्ष में हूं, लेकिन लोग परेशान होकर गांव छोड़ दें, यह उचित नहीं। शिक्षा व्यवस्था और कौशल विकास के क्षेत्र में मिशन मोड पर काम करना होगा। उसकी सतत अनुश्रवण की व्यवस्था करनी होगी। तब जाकर हम एक समृद्ध और अग्रणी उत्तराखंड के सपने को साकार कर पाएंगे।