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विकास योजनाओं में आपदा प्रबंधन का रखें ध्यान

Mon, 22 Jul 2013 09:14 AM IST
सुधाकर भट्ट
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विकास योजनाओं में आपदा प्रबंधन को शामिल नहीं करना कितना घातक हो सकता है इसका अंदाजा बदरी केदार घाटी में 16-17 जून को हुई तबाही से लगाया जा सकता है।
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बेतरतीब तरीके से नदियों किनारे बने भवन, सड़क बनाने को अत्यधिक मात्रा में डायनामाइट का प्रयोग, जंगलों की अंधाधुंध कटाई के कारण भी इस दैवी आपदा में ज्यादा नुकसान हुआ। अब जबकि बदरी केदार घाटी के पुनर्निर्माण की बात होने लगी है, तो जरूरी है कि इस पुनर्निर्माण में आपदा प्रबंधन को शामिल किया जाए। यदि इस बार भी पुनर्निर्माण में आपदा से मिले सबक का ध्यान नहीं रखा गया तो अगली बार आपदा में कहीं अधिक नुकसान होने की आशंका है।

सड़क निर्माण
पहाड़ में विकास का पहला कदम सड़क निर्माण है। सड़क ही पहाड़ की जीवन रेखा है। गलत तरीके से बनी हुई सड़कें आपदा से होने वाले नुकसान को कई गुना बढ़ा देती हैं। सड़क निर्माण के लिए ज्यादा मात्रा में डायनामाइट का प्रयोग भी घातक साबित होता है। इससे अंदर तक पहाड़ों में दरारें पड़ जाती हैं, जिससे भूस्खलन के नए क्षेत्र सामने आते हैं। वहीं पेयजल स्रोत भी सूख जाते हैं। तथा नदियों के बहाव में भी बदलाव आता है।
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पहाड़ों पर नदियों के किनारे कई राष्ट्रीय राजमार्ग भी हैं। करीब चार साल पहले सड़क चौड़ीकरण के अभियान ने फायदा कम और नुकसान अधिक पहुंचाया। आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक अधिकतर नए भू स्खलन वाले क्षेत्र राजमार्ग पर ही विकसित हुए। विशेषज्ञों के मुताबिक सड़कों के निर्माण में बारूद का इस्तेमाल नियंत्रित तरीके से ही होना चाहिए। हाल यह है कि ऐसे कई गांव हैं जो सड़क बनने के बाद अपने पेयजल स्रोत खो चुके हैं।

भवन निर्माण
प्रदेश में नदियों के किनारे ही चार धाम यात्रा रूट है। यात्रा रूट होने के कारण यहां के कस्बों में ज्यादा विकास हुआ। नदी तटों पर नए-नए भवनों के साथ ही दुकानें भी बनीं। इसके अलावा कई मंजिला इमारतों का निर्माण भी किया गया। लेकिन इस विकास और निर्माण में आपदा प्रबंधन का ध्यान लगभग ना के बराबर रखा गया। ऐसे में नदियों के कटाव का सीधा असर इन कस्बों पर पड़ा। यही नहीं बिल्डिंग बायलॉज की अनदेखी भी आपदा के समय घातक साबित हुई।

अति संवेदनशील क्षेत्र होने के बावजूद यहां रेन वाटर हार्वेस्ंिटग और भूकंप रोधी मकान बनाने की कोई कोशिश नहीं की गई। यही नहीं इन कस्बों के विकास के लिए नदियों के किनारे लगे पेड़ों को भी काटने में संकोच नहीं किया गया। जिससे नदियों के कटाव में तेजी आ गई। गौरीकुंड में तीन मंजिला इमारतों के ढहने का प्रमुख कारण नदी कटाव ही हैं।  विशेषज्ञों की माने तो किसी भी निर्माण से पहले जोखिम का आकलन जरूरी है। इस आकलन के आधार पर ही निर्माण होने चाहिए।

विस्थापन का कारण बन जाएगी सड़क
गोविंदघाट से कुछ किलोमीटर की दूरी पर बदरीनाथ हाईवे पर बसे गांव लामबगड़ के लोग ही सड़क के विरोध में उतर आए हैं। अलकनंदा के किनारे बनी सड़क जून में आई दैवी आपदा में बह गई। इसके बाद बीआरओ ने यहां पर सड़क बनाने की शुरुआत की तो गांव के लोग ही विरोध में खड़े हो गए। इस विरोध का प्रमुख कारण भूस्खलन है।

अब यहां जो भी सड़क बनेगी, वह पहाड़ को काटकर ही बनेगी। पहले ही भू धंसाव का शिकार बना लामबगड़ पहाड़ काटने से भूस्खलन की चपेट में भी आ जाएगा। गांव वालों की मांग है कि पहले वरुणावत की तरह पहाड़ का उपचार किया जाए फिर सड़क बनाने की बात की जाए। यह जरूरी भी है, अगर ऐसा नहीं हुआ तो गोविंदघाट को बदरीनाथ से जोड़ने वाली यह सड़क पूरे गांव का विस्थापन का कारण बन जाएगी।

इधर सुरंग बने उधर पड़ी मकानों में दरार
गोविंदघाट के पास स्थित अति संवेदनशील गांव चांई के लोगों को यह कतई स्वीकार नहीं है कि उनके यहां जल विद्युत परियोजना बने। कारण यह है कि जल विद्युत परियोजना की शुरुआत के बाद से ही इस गांव के मकान दरकने लगे है। इतना ही नहीं यह गांव भूस्खलन की चपेट में भी आ गया है।

यहां पर एक हाइड्रो परियोजना का निर्माण हो रहा है। इसके लिए सुरंग और बैराज बनाए जा रहे है। जिसका सीधा असर गांवों में बने मकानों पर पड़ रहा है। गांव वालों का कहना है कि जल विद्युत परियोजना में गांव वालों की हिस्सेदारी न के बराबर है, लिहाजा गांव को फायदा न के बराबर और नुकसान सबसे अधिक हो रहा है।

आपदा प्रबंधन अधिनियम के प्रावधान
राज्य सरकार के सभी विभागों (जिसकी आपदा रोकथाम और न्यूनीकरण में भूमिका है) को आपदा प्रबंधन प्राधिकरण में निर्धारित दिशा निर्देश पर ध्यान देना चाहिए। आपदा की रोकथाम और न्यूनीकरण के उपायों को अपनी विकास योजनाओं और परियोजनाआें में शामिल करना चाहिए। साथ ही इसके लिए बजट का आवंटन भी करना चाहिए।
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पर्यावरण के प्रति सरकार संवेदनशील है। किसी भी तरह का निर्माण पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना कराए जाने का पूरा मन बना लिया गया है। पहाड़ के विकास के लिए जो भी संभव होगा वह किया जाएगा।
- यशपाल आर्य, आपदा प्रबंधन मंत्री

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