मैती आंदोलन एक भावनात्मक आंदोलन है। जो आज उत्तराखंड की महिलाओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हो चुका है। मैती शब्द का अर्थ मायका होता है। इस आंदोलन के प्रणेता कल्याण सिंह रावत ने महिलाओं व पर्यावरण के बीच एक रचनात्मक एवं भावनात्मक रिश्ता बनाने का प्रयास किया है। इस संगठन का संचालन गांव की सभी अविवाहित महिलाएं मैती नाम से करती हैं। वे इस संगठन के माध्यम से फल, चारा ईंधन तथा जमीन के जल स्तर को बनाए रखने वाले वृक्ष के पौधे तैयार करती हैं। मैती आंदोलन का भावनात्मक पक्ष यह है कि जब कोई लड़की किसी पौधे को अपने हाथों से रोपती है, तो उस पौधे से उसका भावनात्मक रिश्ता जुड़ जाता है। और शायद यही भाव उसे उस पौधे की देखभाल के लिए करने के लिए प्रेरित करता है।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन
उत्तराखंड राज्य आंदोलन में महिलाओं की अहम भूमिका रही है। 1994 में उत्तराखंड की महिलाओं ने अलग राज्य की मांग को लेकर सड़कों पर उतर कर आंदोलन किया। उत्तराखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाने में जितना योगदान यहां के पुरुष वर्ग ने दिया उससे कई गुना अधिक योगदान यहां की महिलाओं ने दिया। इस आंदोलन के दौरान घटित मुजफ्फरनगर कांड महिलाओं की सक्रिय भागीदारी की याद दिलाता है। इस आंदोलन के दौरान आंदोलनकारी महिलाएं हंसा धनाई एवं बेलमती चौहान शहीद हो गई थीं। वह सन 1994 का वर्ष ही था जिसने उत्तराखंड की मातृशक्ति को घर-बार चूल्हा-चौका छोड़ हाथों में दराती लिए सड़कों पर उतार दिया था। आंदोलन में स्व. कौशल्या डबराल समेत सुशीला बलूनी, द्वारिका बिष्ट, कमलापंत, धनेश्वरी देवी, निर्मला बिष्ट, जगदंबा रतूड़ी, शकुंतला गुसाई, स्व. शकुंतला मैठानी, कलावती जोशी, यशोदा रावत, उषा नेगी, विमला कोठियाल विमला नौटियाल समेत तमाम उत्तराखंड की महिलाओं के संघर्ष से राज्य गठन का सपना साकार हुआ है।