..तो क्या यशपाल के साथ कांग्रेस के बागियों की वापसी का रास्ता भी खुल गया है। यशपाल आर्य की घर वापसी के साथ ही सियासी फिजाओं में यह सवाल भी तैरने लगा है। सोमवार को ही उन्होंने अपने बेटे और नैनीताल से विधायक संजीव आर्य और पूर्व में कांग्रेस से जुड़े रहे वरिष्ठ सिख नेता हरेंद्र सिंह लाडी के साथ पुन: कांग्रेस का दामन थामा। चर्चा तीन विधायकों के पार्टी में शामिल होने की थी। इनमें बागी उमेश शर्मा काऊ का नाम भी शामिल था। काऊ की सोमवार सुबह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे राहुल गांधी से मुलाकात भी हो गई थी। लेकिन ऐन वक्त पर उनकी कांग्रेस पार्टी में ज्वाइनिंग टल गई। लेकिन भाजपा के लिए अभी खतरा टला नहीं है। यशपाल बागियों की पुन: वापसी का बड़ा सूत्रधार बन सकते हैं, इसे लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों में ही चर्चाओं का दौर भी शुरू हो चुका है।
कहीं किसानों का विरोध तो नहीं पार्टी बदलने का कारण
यशपाल आर्य बाजपुर की आरक्षित सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। यह सीट सिख और किसान बहुल मानी जाती है। इधर, सत्ता विरोधी लहर और किसानों का आंदोलन कहीं आने वाले चुनाव में भारी न पड़ जाए, इससे भी यशपाल की पार्टी बदलने की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। सियासी जानकारों का मानना है कि कांग्रेस में जाने के पीछे एक बड़ा कारण तराई में बीजेपी का किसानों के मुद्दे पर खासा विरोध होना भी हो सकता है। ऐसे में बाजपुर सीट से जीतना यशपाल आर्य के लिए बीजेपी के टिकट पर जीतना मुश्किल हो सकता था। इसलिए कांग्रेस का दामन थाम कांग्रेस के टिकट पर वह चुनाव लड़ने जा रहे हैं। इसके अलावा पिछले काफी समय से कैबिनेट की बैठकों में यशपाल आर्य दलितों के मुद्दों को लेकर भी खासे मुखर थे।