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केदारनाथ आपदा के तीन साल बाद में भी नहीं सीखा कोई सबक

Fri, 17 Jun 2016 12:22 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, हल्द्वानी
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most horrible photos of kedarnath disaster - फोटो : file photo
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केदारनाथ आपदा के तीन साल बाद भी आपदा प्रबंधन पूरी तरह से पटरी पर नहीं आ पाया है। इसकी बानगी मानसून से पहले हो रही बरसात में ही खुलकर सामने आ जा रही है। हाल यह है कि कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार बादल फटने की घटनाएं सामने आ रही हैं और लोग बेबस होकर इन घटनाओं का शिकार बन रहे हैं।
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जून 2013 में आई आपदा से कुमाऊं में ज्यादा नुकसान नहीं हुआ था, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कुमाऊं से आपदाओं का कोई लेना देना नहीं रहा।

1998 में ही मालपा में हुए भूस्खलन से कैलाश मानसरोवर यात्रियों का एक पूरा दल ही काल का शिकार बन गया था। 2013 में ही पिथौरागढ़ और बागेश्वर से आपदा ने खासा नुकसान किया था। 2010-11 में ही अल्मोड़ा में दैवीय आपदा से करीब 4000 परिवार प्रभावित हुए थे।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक आपदा प्रबंधन के तहत तैयारी का मतलब है कि आपदा का पूर्वानुमान लगाना और संबंधित खतरे के प्रति संबंधित पक्ष को आगाह करना। ठीक यही बिंदु है जिसमें केदारनाथ की आपदा के तीन साल बाद भी कोई सबक नहीं सीखा गया।
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केदारनाथ आपदा के तुंरत बाद भी मौसम विभाग बरसात का सटीक और स्थानीय स्तर का अनुमान जारी न कर पाने के लिए विवाद के घेरे में आया था। तीन साल बाद भी थोड़े बहुत सुधार के बाद भी यही स्थिति है।

हाल यह है कि बागेश्वर, नैनीताल, अल्मोड़ा आदि क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाओं के बीच मौसम विभाग की केवल भारी बरसात की चेतावनी ही लोगों को मिल पाई। स्थानीय स्तर पर मौसम का सटीक पूर्वानुमान लगाने के लिए डाप्लर रडार लगाने की बाद तीन साल बाद भी आगे नहीं बढ़ पाई।

कहने को राज्य आपदा प्रबंधन कार्ययोजना तैयार की जा चुकी है और न्याय पंचायत स्तर पर मैपिंग तक के दावे हैं। हकीकत यह है कि कार्ययोजना में पंचायतों का सहयोग न के बराबर है। राज्य योजना में गांव के स्तर पर खतरनाक स्थलों की पहचान, सुरक्षित ठिकानों की व्यवस्था करना आदि शामिल है। गांव के स्तर पर यह काम अभी पूरी तरह से नहीं हो पाया है। कारण यह भी है कि जीआईएस मैपिंग का काम अभी पूरा नहीं हो पाया है।

इतना जरूर हुआ कि इस बीच प्रदेश में सरकार ने सेवन डेस्क सिस्टम की बजाय प्रदेश में इंटरएक्टिव रिसपांस सिस्टम की व्यवस्था लागू कर दी है। इस नई व्यवस्था के तहत आपदा के समय संबंधित विभाग एक ही साथ जिले से लेकर राज्य स्तर तक पर सक्रिय हो सकेंगे।

नैनीताल और मसूरी की हैजार्ड मैपिंग हुई पर सुरक्षा ताक पर
2013 की आपदा जून में उस समय आई थी जब चार धाम यात्रा चरम पर थी। जून में ही नैनीताल और मसूरी दो ऐसे शहर हैं जिनकी संवेदनशीलता की रिपोर्ट करीब चार साल पहले जारी हो चुकी है।
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नैनीताल में 50 प्रतिशत से अधिक भवन आपदा के लिहाज से खतरनाक बताए गए हैं। इतना होने पर भी भवन निर्माण को लेकर अभी सख्त कदम नहीं उठाए जा सके हैं।
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