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देहरादूनः कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने किया दो दिवसीय साहित्य सम्मेलन का शुभारंभ

Fri, 22 Nov 2019 12:33 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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देहरादून में आयोजित साहित्य सम्मेलन - फोटो : अमर उजाला
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उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने और दुनिया तक पहुंचाने की जरूरत है। इस कड़ी में राज्य के ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व के स्थलों, कलाओं और साहित्य का संरक्षण किया जाएगा। यह बात दो दिवसीय साहित्य सम्मेलन के शुभारंभ अवसर पर धर्मस्व एवं संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज ने कही। 

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सर्वे चौक स्थित आईआरटीडी ऑडिटोरियम में धर्मस्व एवं संस्कृति विभाग की ओर से आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज, बड़ा अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी हरि चेतनानंद महाराज, रामकृष्ण मिशन सेवा ग्राम के स्वामी अन्नपूर्णानंद महाराज और संस्कृति विभाग की निदेशक बीना भट्ट ने संयुक्त रूप से किया। सतपाल महाराज ने कहा कि उत्तराखंड में कई ऐसे स्थल हैं, जो अपने विशिष्ट गुणों के कारण पहचाने जाते हैं।

यहां की प्राचीन कलाएं, पारंपरिक गीत, लेखन व साहित्य अनूठे हैं। इसका प्रचार-प्रसार होना चाहिए। स्वामी हरिचेतनानंद महाराज ने कहा कि संस्कृत के बिना संस्कृति का संरक्षण नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि अच्छे साहित्य के माध्यम से ही समाज की कुरीतियों को खत्म किया जा सकता है।
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निदेशक बीना भट्ट ने बताया कि राज्य की पारंपरिक नृत्य व गायन शैलियों, संस्कार गीत, वाद्य यंत्रों के वादन की विधाओं, प्राचीन गाथाओं व कहानियों को सहेजा जा रहा है। इस अवसर पर घनानंद ‘घन्ना भाई’, पद्मश्री प्रीतम भरतवाण, बलराज नेगी, प्रेम पंचोली, सुरेशानंद ममर्गाईं, वंदना आदि मौजूद रहीं। 

भारतीय साहित्य पर किया विमर्श
साहित्य सम्मेलन के पहले सत्र में स्वामी अन्नपूर्णानंद महाराज, पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी और डॉ. विष्णुदत्त कुकरेती ने भारतीय साहित्य में अध्यात्म और संस्कृति पर विस्तार से चर्चा की। सत्र का संचालन डॉ. सुशील उपाध्याय और हेमंत बिष्ट ने किया। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय साहित्य पर यहां के अध्यात्म और संस्कृति का गहरा प्रभाव रहा है। 

लोकनाट्य का समृद्ध संसार
दूसरे सत्र में लोकगाथाएं एवं भारतीय लोक नाट्य परंपरा विषय पर विशेषज्ञों ने अपनी राय रखी। दीवान सिंह बजेली, कुलीन जोशी, लक्ष्मी रावत और टीका राम शाह ने कहा कि लोक गाथाओं का इतिहास बेहद समृद्ध रहा है। भारतीय लोक नाट्य परंपरा ने कई बड़े कलाकार दिए हैं। सत्र का संचालन गिरीश चंद्र सुंदरियाल ने किया। 

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