सियासी संकट से नैया पार क्या हुई, मुख्यमंत्री ने अपनी पेशबंदी और बागियों को सबक सिखाने के लिए एक के बाद एक समिति और जांच-पड़ताल के आदेश तो दे डाले। समय बीतने के साथ ही इन दावों और समितियों से सरकार का ध्यान ही हट गया। जिस न्यायिक आयोग से पूरे सियासी संकट की जांच कराई जानी थी, उसके अध्यक्ष के चयन की चर्चा भी नहीं हो रही है। जिन तीन मंत्रियों को भूमि घोटालों की पड़ताल करनी थी, उन्हें भी इस काम के लिए फुर्सत नहीं है।
बीती 18 मार्च से शुरू हुआ सियासी संकट का अंत 54 दिन बाद सरकार वापसी के साथ हुआ था। इन दो महीनों के दौरान जो भी गतिविधियां हुईं, उनकी जांच के लिए सरकार ने बीते माह एक न्यायिक कमेटी के गठन कैबिनेट की बैठक में मुहर लगाई थी।
इसके तहत हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में या फिर एकल सदस्यीय कमेटी का गठन होना था। तब मुख्यमंत्री हरीश रावत ने दावा किया था कि जल्द ही सेवानिवृत्त न्यायाधीश का चयन किया जाएगा। कमेटी यह देखेगी कि कहीं ‘फाउल प्ले’ तो नहीं हुआ यानी विधायकों की खरीद-फरोख्त तो नहीं हुई। साथ ही सरकार गिराने के लिए कहीं कोई षड़यंत्र तो नहीं किया गया।
घोषणा बनकर रह गई जमीन घोटाले की जांच समिति
हरीश रावत
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कैबिनेट मंत्री दिनेश अग्रवाल, दिनेश धनै और यशपाल आर्य की एक समिति को जमीन घोटाले की जांच करनी थी। यह जमीन घोटाले दोनों दलों की सरकारों के कार्यकाल के दौरान हुए, जिसमें राजनीतिक छवि के लोगों ने अपने रसूख से करोड़ों रुपये की जमीन अपने नाम करा ली थी।
हरीश रावत ने कहा था कि कमेटी इनकी पूरी सूची बनाएगी, जिसे सार्वजनिक किया जाएगा। लेकिन, 20 दिन से ज्यादा समय बीतने के बावजूद न तो न्यायिक समिति के अध्यक्ष का नाम तय हो सका और न ही मंत्रियों की समिति ने भूमि घोटाले की पड़ताल में एक कदम आगे बढ़ाया। सूत्रों की मानें तो भूमि घोटाले में बड़ी संख्या में सरकार के करीबी और सत्ता में शामिल लोगों के नाम भी हैं। इसी के चलते इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
इनका है कहना
मुख्यमंत्री ने जो भी फैसले लिए हैं, उसके लिए सरकार प्रतिबद्ध है। न्यायिक समिति के गठन की प्रशासनिक प्रक्रिया चल रही है।
-सुरेंद्र कुमार, मीडिया सलाहकार, मुख्यमंत्री