आपदा के साए में जी रहे उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन के लिए मुख्यमंत्री जी के पास भी शायद फुर्सत नहीं है। तभी तो राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की बैठक कराने का प्रस्ताव तीन दिन पहले उन्हें भेजा गया लेकिन उस पर संज्ञान आज तक उन्होंने नहीं लिया।
यह तब है जबकि इस प्राधिकरण का अध्यक्ष भी खुद मुख्यमंत्री हरीश रावत हैं और आपदा प्रबंधन मंत्री होने के नाते उपाध्यक्ष भी हैं। बात सिर्फ बैठक की नहीं है बल्कि आपदा प्रबंधन की तैयारियों की भी। प्रदेश में जहां चारधाम यात्रा शुरू है वहीं बेमौसमी बारिश से भूस्खलन का खतरा भी है।
इतना ही नहीं कई जगह अब भी सड़कें बाधित हो रही हैं। ऐसे में संबंधित विभाग योजनाओं में आपदा प्रबंधन के मानकों का पालन कर भी रहे हैं या नही, इसे सुनिश्चित करवाना भी है। भूकंप के लिहाज से पूरा उत्तराखंड अत्यधिक संवेदनशील है। हाल ही में नेपाल का आए भूकंप के साथ प्रदेश में भी झटके महसूस किए गए।
यही नहीं जून 2013 की केदारनाथ आपदा से भी यह साबित हो चुका है कि प्रदेश पर अचानक आने वाली बाढ़, बेमौसम बरसात आदि का खतरा भी मंडरा रहा है। बावजूद आपदा प्रबंधन की सर्वोच्च संस्था राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को बैठक करने के लिए फुर्सत नहीं है।
चार धाम यात्रा के शुरू होने के एक पखवाड़े बाद प्राधिकरण की बैठक का प्रस्ताव मुख्यमंत्री को भेजा गया। फिर भी इस प्रस्ताव को स्वीकृति नहीं मिली। मुख्यमंत्री के अलावा स्वास्थ्य, सिंचाई, परिवहन और ग्राम्य विकास मंत्री प्राधिकरण के सदस्य हैं। मुख्य सचिव प्राधिकरण के सीईओ हैं। हाल यह है कि गठन के बाद से अब तक इसकी कुल पांच बैठकें ही हुई हैं।
वित्त में लटका है प्राधिकरण का ढांचा
प्राधिकरण का ढांचा भी करीब 15 दिन से वित्त में धूल फांक रहा है। 70 पदों का यह ढांचा अभी वित्त से ही बाहर नहीं निकला है। वित्त के मुताबिक इसका परीक्षण किया जा रहा है।
प्राधिकरण के पूरे प्रदेश के नेटवर्क को देखते हुए प्राधिकरण के सचिवालय की जरूरत है। ढांचा न होने की वजह से आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का बाकी का काम भी अधर में ही है। हालांकि बताया जा रहा है कि आईटी पार्क में जमीन की व्यवस्था की जा रही है।
बैठक आयोजित कराने के लिए सीएम को प्रस्ताव भेजा गया है। मानसून से पहले प्राधिकरण की बैठक करने पर विचार किया जा रहा है।
- विजय सारस्वत, उपाध्यक्ष, राज्य आपदा प्रबंधन सलाहकार समिति