फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

उत्तराखंड सत्ता संग्राम 2022: जब स्थानीय के नाम लेफ्ट और राइट ने मिलाई थी कदमताल, कभी दी पटखनी तो कभी मिली हार

Sat, 22 Jan 2022 02:10 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal कौशल सिखौला, संवाद न्यूज एजेंसी, हरिद्वार

सार

ऐसा पहला चुनाव वर्ष 1968 में हुआ था। तब हरिद्वार विधानसभा सीट को परवादून सीट कहा जाता था, जिसका विस्तार ऋषिकेश और डोईवाला तक था।
विज्ञापन
- फोटो : सोशल मीडिया
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

आजादी के बाद हरिद्वार में हुए दो विधानसभा चुनाव सचमुच अभूतपूर्व थे। चुनावों में स्थानीय के नाम पर अस्मिता बचाने का ऐसा सवाल खड़ा हुआ कि पार्टियों की बाध्यता के सारे बंधन टूट गए। नगर की प्रतिष्ठा बचाने के नाम पर अलग-अलग दलों के कार्यकर्ता एक मंच पर आ गए थे। नतीजा यह हुआ कि एक बार तो उस जमाने में पंडित जवाहर लाल नेहरू के घनिष्ट मित्र और यूपी के कैबिनेट मंत्री रहे शांतिप्रपन्न शर्मा को भारी पराजय झेलनी पड़ी।

विज्ञापन


Harak Singh Rawat: जीत की उम्मीद में कांग्रेस पी गई अपमान का घूंट, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का भी समर्पण

ऐसा पहला चुनाव वर्ष 1968 में हुआ था। तब हरिद्वार विधानसभा सीट को परवादून सीट कहा जाता था, जिसका विस्तार ऋषिकेश और डोईवाला तक था। चुनाव में हरिद्वार शहर से किसी को कांग्रेस का उम्मीदवार बनाने की बात जोर पकड़ गई। लेकिन ऋषिकेश निवासी शांतिप्रपन्न शर्मा बड़े नेता थे, विधायक और कैबिनेट मंत्री थे। इसलिए हरिद्वार के लोगों की नहीं सुनी गई। इस पर हरिद्वार की दलीय राजनीति गौण हो गई और जनसंघ, सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट आदि सभी एक मंच पर आ गए।
विज्ञापन


बुरी तरह पराजित हो गए थे शांतिप्रपन्न शर्मा
सभी ने हरिद्वार के गृहस्थ महंत घनश्याम गिरी को संयुक्त प्रत्याशी घोषित कर दिया। बहुत मधुर और शर्मीले महंत घनश्याम गिरी की लड़ाई हरिद्वार की लड़ाई बन गई। देखते ही देखते निर्दलीय लड़ रहे घनश्याम गिरी का चुनाव प्रचार ने जोर पकड़ लिया था और शांतिप्रपन्न शर्मा बुरी तरह पराजित हो गए थे।

ऐसा दूसरा चुनाव 1985 में अंबरीष कुमार ने लड़ा। यह उनका पहला विधानसभा चुनाव था। उन्हें कांग्रेस का टिकट मिलना निश्चित था। लेकिन टिकट इंदु राणा को मिल गया। अंबरीष समर्थक नाराज हो गए। इंदु के घर मिठाई बंटने लगी।
विज्ञापन


अगले दिन अंबरीष समर्थक प्रदर्शन कर रहे थे कि इंदु राणा का भी टिकट काटकर सहारनपुर के महावीर राणा को कांग्रेस प्रत्याशी घोषित कर दिया। तब बड़ा बवाल हुआ और अमरीष ने क्रांतिकारी मंच बनाने की घोषणा कर दी। अमरीष को मंच का प्रत्याशी बनाया गया। स्थानीय और बाहरी के नाम पर अमरीष व महावीर के बीच कांटे की टक्कर हुई। बाद में मतगणना केंद्र पर हुए जोरदार हंगामे के बाद महावीर राणा को 71 मतों से विजयी घोषित किया गया।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें