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तीलू रौतेली पुरस्कार 2018: चुनौतियों की ‘पथरीली’ राह पर चलकर पाया मुकाम 

Sat, 07 Jul 2018 12:42 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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तीलू रौतेली पुरस्कार पाने वाली महिलाएं और युवतियां
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उन्होंने समाज की बंदिशों के बावजूद न केवल चुनौतियों की ‘पथरीली’ राह चुनी बल्कि मेहनत के जरिये मुकाम भी हासिल किया। यह दास्तां है तीलू रौतेली पुरस्कार से सम्मानित होने वाली प्रदेश की 13 महिलाओं की, जिन्होंने शिक्षा, समाजसेवा, खेल समेत विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर काम किया। मुुकाम तक पहुंचने का इन महिलाओं का सफर आसान नहीं था। उन्हें लोगों का विरोध झेलना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद उनका हौसला नहीं डिगा। आज वह हजारों लोगों के लिए आदर्श हैं। तीलू रौतेली पुरस्कार से सम्मानित हुईं ऐसी ही 13 महिलाओं ने अपनी सफलता और संघर्ष को अमर उजाला के साथ साझा किया।  

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शायरा ने दिलाई तीन तलाक से मुक्ति
ऊधमसिंह नगर जिले के काशीपुर निवासी शायरा बानो का निकाह वर्ष 2002 में हुआ था। ससुराल वाले दहेज की मांग कर रहे थे, जो पूरी नहीं होने पर पति ने वर्ष 2015 में उन्हें तीन बार बोलकर तलाक दे दिया था। जिसके बाद उन्होंने तीन तलाक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक पर एतिहासिक फैसला देते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया। इस फैसले को मुस्लिम समुदाय की महिलाओं ने खूब सराहा। उन्होंने कहा कि मुस्लिम महिलाओं को भी सुरक्षित भविष्य के साथ आजादी से जीने का अधिकार है। समाज केवल पुरुषों के लिए नहीं बल्कि महिलाओं के लिए भी है। 

गढ़वाली कविताओं को पहचान दे रहीं उपासना 
रुद्रप्रयाग की ह्यूण गांव की उपासना सेमवाल गढ़वाली कविताओं को पहचान दे रही हैं। वह करीब सात वर्षों से गढ़वाली में कविताएं और गीत लिख रही हैं। फेसबुक कू रोग, हे मेरा देश का रजा मोदी, सी बुना छा हम गढ़वाली बिसर गए... जैसी कविताओं से उनको अलग पहचाने मिली। वह बताती हैं कि उनका लक्ष्य गढ़वाली भाषा देश-दुनिया में पहुंचाना है। 
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लोगों के ताने ने बढ़ाई हेमा की हिम्मत  
पिथौरागढ़ की हेमा थलाल के पति का वर्ष 2010 में निधन हो गया था। बेटियां होने पर लोग उनको ताने देते थे। जिसके बाद उन्होंने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओे अभियान शुरू किया। वर्ष 2011 की जनगणना में पिथौरागढ़ में बालिकाओं की दर एक हजार पुरुष पर 816 थी। उनके अभियान के बाद यह अनुपात बढ़कर 915 हो गया। बेटियों के अधिकारों और पढ़ाई को लेकर उनका अभियान जारी है। 

सैकड़ों को साक्षर बना रहा पुष्पा का शालाघर 
हरिद्वार निवासी डॉ. पुष्पा रानी वर्मा कहती हैं कि समाज में बदलाव तभी आ सकता है, जब सब साक्षर हो। वर्ष 2015 में पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के मुख्यमंत्रित्व काल में ‘सरकार आपके द्वार’ कार्यक्रम के बाद मैंने शालाघर खोलने का निर्णय लिया। आज रुड़की और बहादराबाद के शालाघर में 14 वर्ष या इससे अधिक आयु की सैकड़ों बालिकाओं और महिलाओं को शिक्षित किया जा रहा है। 

त्रितिक्षा ने खेल के जरिये किया राज्य का नाम रोशन  
हल्द्वानी (नैनीताल) की त्रितिक्षा कपिल वर्ष में 2013 में ताइक्वांडो के जरिये उत्तराखंड का नाम रोशन कर रही हैं। 12वीं की छात्रा त्रितिक्षा स्कूल गेम्स नेशनल, खेलो इंडिया नेशनल, सीबीएसई नेशनल समेत कई खेलों में दर्जनों मेडल जीत चुकी हैं। वह कहती हैं कि बचपन से ही खेल में प्रदेश का नाम रोशन करने का सपना था, जो पूरा हो रहा है। 

निर्मला को बेचारी कहलाना पसंद नहीं 
ऊधमसिंह नगर के बाजपुर की रहने वाली निर्मला दिव्यांग हैं। कहती हैं कि उन्हें बेचारी कहलाना पसंद नहीं है। जिसके चलते कड़ी मेहनत की। बताया कि वह स्पोर्ट्स व्हील चेयर बैडमिंटन और एथलीट में अब तक 16 पुरस्कार जीत चुकी हैं। अब दिव्यांग खिलाड़ियों को प्रोत्साहित कर रही हैं। 

अंजू को लोगों की जान बचाना है अच्छा लगता है  
ऋषिकेश की अंजू तीन लोगों की जान बचा चुकी हैं। वह बताती हैं कि जब वह छोटी थीं, तब उनके पिता पारसनाथ ने गंगा में डूबते हुए एक व्यक्ति को बचाया था। गंगा किनारे रहने के चलते मुझे भी तैराकी आती है। अंजू ने वर्ष 2011 में एक महिला, 2014 में एक बुजुर्ग और 2017 में एक लड़की को डूबने से बचाया था। 

स्वरोजगार को बढ़ावा देना है हेमलता का उद्देश्य 
अल्मोड़ा की हेमलता भट्ट 20 वर्षों से समाजसेवा कर रही हैं। उन्होंने बताया कि स्वरोजगार से लोगों को आर्थिक रूप से मजबूत बना रही हैं। कमजोर आय वर्ग के महिला और पुरुषों को प्रशिक्षण देकर उन्हें स्वरोजगार से जोड़ने का कार्य करती हूं। इस कार्य को करने में काफी परिवार का भी काफी सहयोग है। 

सविता ने 105 बच्चियों को स्कूल तक पहुंचाया 
उत्तरकाशी की सविता चमोली डामटा नौगांव स्थित राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय में शिक्षिका हैं। वह बताती हैं कि करीब सात साल पहले जब यह विद्यालय खुला था, तब यहां बालिकाएं नहीं आती थी। हमने लोगों के घर-घर जाकर अभिभावकों को शिक्षा का महत्व बताया। आज विद्यालय में 105 छात्राएं हैं। 

उषा ने पढ़ाई के साथ खेल में भी नाम किया 
उत्तरकाशी की उषा किरण बिष्ट भी डामटा नौगांव स्थित राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाती हैं। कहती हैं कि गांव दूर-दूर होने की वजह से शुरुआत में यहां छात्राओं की संख्या न के बराबर थी। हम सभी ने मेहनत की, अब न केवल यहां सौ से अधिक छात्राएं हैं, बल्कि वह पढ़ाई के साथ ही खेल में भी नाम कमा रही हैं।

छब्बी ने साहस से दी बाघ को मात 
उत्तरकाशी की छब्बी देवी गृहणी हैं। 18 जुलाई 2010 की रात वह अपनी दोनों बेटियों के साथ घर के बाहर लेटी थीं। रात में उन्हें बाघ उठाकर ले गया था। जिसके बाद उनकी बाघ के साथ खींचतान हुई। बाघ से छूटकर वह दौड़कर घर पहुंचीं। इसके बाद घर के बाहर सो रही दोनों बेटियों को बाघ से बचाया। करीब छह महीने चंडीगढ़ में उनका इलाज चला। वह कहती हैं कि साहस से किसी भी मुसीबत को भी मात दी जा सकती है।

कराटे में प्रदेश का नाम रोशन कर रहीं मृणालिका 
दून की चंद्रबनी निवासी मृणालिका अत्रेय कराटे में प्रदेश का नाम रोशन कर रही हैं। बताती हैं कि पिता के निधन के बाद स्कूल की पढ़ाई छूट गई थी। जिसके चलते ओपन स्कूल से इंटर पास किया। कराटे में कई मेडल हासिल किए। उनका लक्ष्य कराटे में प्रदेश का नाम रोशन करना है। 

पल्लवी ने साबित किया, कमजोर नहीं हैं महिलाएं 
बागेश्वर जिले की पल्लवी उप्रेती ताइक्वांडो के जरिये प्रदेश का नाम रोशन कर रही हैं। वह कहती हैं कि महिलाएं कमजोर नहीं हैं। जब मैंने ताइक्वांडो सीखना शुरू किया तो सभी ने इसका विरोध किया। पड़ोसियों ने तो यहां तक कह दिया कि हड्डी टूट जाएगी, यह लड़कियों के लिए नहीं है, लेकिन आज अपने खेल की बदौलत मैंने उन लोगों की सोच बदल दी, जो महिलाओं को कमजोर समझते थे। 

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