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चोर की जुबानी सुनो चोरी की कहानी

Mon, 14 Jul 2014 11:50 AM IST
राकेश शर्मा/ अमर उजाला, देहरादून
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जमाने और वक्त के साथ हर चीज बदलती है। इसी तरह चोरों में भी बदलाव आया है। उनके रहन-सहन से लेकर उनकी कार्यशैली पहले से काफी अलग हो गई है।
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चोरी के बारे में उनकी सोच और नजरिया भी बदला है। शायद इस बात को पुलिस नहीं समझ पा रही है।

यही वजह है कि तमाम वारदातों में वह चोरों से मात खा रही है। चोरों में किस-किस तरह का बदलाव आया है जानिये एक चोर की जुबानी।

हम केवल नकदी और जेवर चुराते हैं...

कभी चोरी की दुनिया का शहंशाह रहा और आजकल ऐसी वारदातों से तौबा करने वाले शख्स ने अमर उजाला संवाददाता को बताया कि नई पीढ़ी के कारों में चलने वाले चोर सामान समेटने में विश्वास नहीं रखते हैं।

इनका टारगेट नकदी और जेवर हासिल करना होता है। अन्य कीमती सामान चुराने के बाद उसे बेचने के साथ बरामद होने का खतरा रहता है। इसलिए ऐसे सामनों को छोड़ दिया जाता है।

बताया कि मकानों में नकदी और जेवर कहां रखे जाते हैं इससे नए चोर अच्छी तरह से वाकिफ होते हैं। नकदी तो सुख-साधनों पर फटा फट खर्च हो जाती है।

जेवर खरीदने वाले, उसे गला देता है। इस कारण उन जेवरातों के बरामद होेने की संभावना खत्म हो जाती है।

चोरी करना एक कला है...

चोरी करना एक कला है। वारदात करें और सुबूत न मिले इसका खास ध्यान रखना पड़ता है।

चूंकि हर पल रिस्की होता है इसलिए बहुत सावधानी से वारदात को अंजाम दिया जाता है। इस दौरान सांसें अटकी रहती हैं। घटनास्थल पर कार अथवा पहचान होने का संदेह होने पर हाथ आए माल को खुद से अलग कर दिया जाता है।

एक साथी माल लेकर बस अथवा दूसरे साधनों से तय ठिकाने के लिए निकल जाता है। यह फंडा इसलिए इस्तेमाल किया जाता है कि ताकि माल समेत पकड़े जाने का रिस्क न रहे।

चोरी का धंधा विश्वास पर चलता है, लेकिन कभी कभी बदनीयती विश्वासघात का कारण बन जाती है। साथी ही माल डकार जाते हैं या उसे कम दर्शाते हैं।
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मुकदमों की पैरोकारी में खूब खर्चा

यह शख्स बताता है कि एक बार पकड़े जाने पर चोर कानून के रखवालों की नजर में आ जाता है। इसके बाद तो हर चोरी की वारदात के बाद उसे प्रताड़ना झेलनी ही पड़ती है।

स्थिति ऐसी आ जाती है कि केसों की पैरोकारी का खर्च जुटाने के लिए कई चोरी की घटनाएं अंजाम देनी पड़ती हैं। मुकदमों की पैरोकारी में काफी खर्च करना पड़ता है।

चोरी का माल मोहरी में...
कई साल तक चोरी के धंधे में धमक रखने वाले इस शख्स का कहना है कि आज भी इस धंधे में बरसों पुरानी कहावत कि चोरी का माल मोहरी में सटीक बैठती है।

कितना बड़ा हाथ लग जाए लेकिन हिस्से में कुछ खास नहीं आता। कई हाथों से गुजरते हुए माल कहां खर्च हो जाता है पता ही नहीं चलता। नशाखोरी और दूसरे मनोरंजनों पर जमकर पैसा उड़ाया जाता है।

कुछ दिन शान की जिंदगी जीने के बाद फिर फक्कड़ वाली स्थिति हो जाती है।

(नोटः इस खबर से संबंधित किसी भी सुझाव या सवाल के लिए मेल आईडी-rakeshk@mrt.amarujala.com और इस नंबर-9675501486 पर संपर्क कर सकते हैं।)
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