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पितृ विसर्जन के बाद होता है एक और श्राद्ध

Thu, 11 Sep 2014 02:25 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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16 दिनों का श्राद्ध पक्ष 23 सितंबर को पितृ विसर्जनी अमावस्या के साथ संपन्न हो जाएगा। लेकिन एक श्राद्ध ऐसा है जो पितृ विसर्जन के बाद भी होता है।
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संन्यासियों और नाना का होता है पहला नवरात्र
पहले नवरात्र को संन्यासियों एवं नाना का श्राद्ध करने की शास्त्रीय मान्यता है। श्राद्ध पक्ष की कुछ तिथियां विशेष हैं। पंचमी तिथि भरणी नक्षत्र में पड़ रही है। जो तिथि इस नक्षत्र में आती है उस दिन किए गए श्राद्ध तर्पण का फल विष्णुलोक में किए गए श्राद्ध के समान है।

ज्योतिषाचार्य डॉ. प्रतीक मिश्रपुरी के अनुसार इस बार त्रयोदशी तिथि को मघा नक्षत्र पड़ेगा। मघा नक्षत्र में श्राद्ध करने का फल 13 गुना अधिक मिलता है। नवमी तिथि को उन स्त्रियों का श्राद्ध होता है, जो सौभाग्यवती रहते हुए दिवंगत होती है।
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कुछ पर्वतीय अंचलों में इसी दिन माता का श्राद्ध भी किया जाता है। चर्तुदशी तिथि को उन पुरखों का श्राद्ध होता है, जो अकाल मृत्यु का शिकार होकर दिवंगत हुए हों। द्वादशी तिथि को वैष्णव संप्रदाय के साधुओं का श्राद्ध उनके परिजन कर सकते हैं।
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एक श्राद्ध ऐसा है, जो अमावस्या को पितृ विसर्जित कर देने के बाद पहले नवरात्र के दिन किया जाता है। शैव मतावलंबी संन्यासियों का श्राद्ध अश्विन शुक्ल प्रतिपदा के दिन होता है। इसी दिन दौहित्र अपने नाना का श्राद्ध कर सकता है।
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