देवी कूष्मांडा ने विकराल रुप धारण कर त्रिशूल और कटार से राक्षसों का वध किया। तब अतापी और बतापी नाम के दो राक्षस बचकर भाग गए, जिनमें एक दैत्य मंदाकिनी नदी किनारे सिल्ली और दूसरा बद्रीनाथ धाम में शंख में जा छुपा। मान्यता है कि इसी वजह से आज भी बदरीनाथ धाम में शंख नहीं बजता है।
सिल्ला गांव के आचार्य विश्वंभरदत्त नौटियाल और माहेश्वर पुरोहित बताते हैं कि जब भी साणेश्वर महाराज की दिवारा यात्रा का महायज्ञ होता है, तो कुमड़ी गांव से मां कुष्मांडा देवी को पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ ध्याण के रूप में आमंत्रित किया जाता है। देवी, स्वयं यज्ञकुंड को खोलती हैं और 18 दिनों तक महायज्ञ की सुरक्षा करती हैं।
कुमड़ी गांव में देवी का मूल मंदिर
आराध्य मां कूष्मांडा का मूल मंदिर जखोली ब्लॉक के सिलगढ़ पट्टी के कुमड़ी गांव में है। यहां देवी की प्राचीन अष्टधातु की अष्टभुजा मूर्ति स्थापित है। साथ ही प्रस्तर प्रतीक भी हैं। स्थानीय और आसपास के गांवों के लोग देवी दर्शनों को पहुंचते हैं। चैत्र व शारदीय नवरात्रों में यहां कूर्मासना स्त्रोत का पाठ होता है।