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नवरात्रि 2021: उत्तराखंड के इस गांव में सुख की देवी के रूप में पूजी जाती हैं कूष्मांडा, जुड़ी है अनोखी कहानी

Thu, 07 Oct 2021 03:40 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal विनय बहुगुणा, अमर उजाला, रुद्रप्रयाग

सार

मार्कण्डेय पुराण के देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) में चतुर्थ क्रम में कूष्मांडा के जन्म का वर्णन किया गया है। देवी को स्थानीय परिवेश में कुमासैंण नाम से भी पूजा जाता है। कुमासैंण और भगवान साणेश्वर धर्म भाई-बहन हैं।
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कूष्मांडा - फोटो : SELF
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विस्तार
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देवभूमि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में अगस्त्यमुनि ब्लॉक के सिल्ला गांव में मां दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप कूष्मांडा देवी को सुख की देवी के रूप से पूजा जाता है। मान्यता है कि सिल्ला गांव में ही महर्षि अगस्त्य की कोख से कूष्मांडा देवी का जन्म हुआ था।

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कुमासैंण और भगवान साणेश्वर धर्म भाई-बहन
मार्कण्डेय पुराण के देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) में चतुर्थ क्रम में कूष्मांडा के जन्म का वर्णन किया गया है। देवी को स्थानीय परिवेश में कुमासैंण नाम से भी पूजा जाता है। कुमासैंण और भगवान साणेश्वर धर्म भाई-बहन हैं।

सिल्ला गांव स्थित भगवान साणेश्वर महाराज मंदिर से कई प्राचीन मान्यता जुड़ी हैं। कहा जाता है कि जब हिमालय क्षेत्र में असुरों का आतंक था, तब ऋषि-मुनि अपने आश्रमों में पूजा-अर्चना नहीं कर पाते थे। ऐसी ही स्थिति साणेश्वर महाराज के मंदिर में भी थी। यहां जो भी ब्राह्मण पूजा-अर्चना को पहुंचते, राक्षस उन्हें मार डालते। तब साणेश्वर महाराज ने अपने भाई अगस्त्य ऋषि से मदद मांगी।
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वे सिल्ला गांव पहुंचे और मंदिर में पूजा-अर्चना करने लगे, लेकिन राक्षसों का उत्पात देखकर वे भी सहम गए। उन्होंने आदिशक्ति मां जगदंबा का ध्यान किया और अपनी कोख को मला, जिससे कूष्मांडा ने जन्म लिया।

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त्रिशूल और कटार से राक्षसों का वध किया

देवी कूष्मांडा ने विकराल रुप धारण कर त्रिशूल और कटार से राक्षसों का वध किया। तब अतापी और बतापी नाम के दो राक्षस बचकर भाग गए, जिनमें एक दैत्य मंदाकिनी नदी किनारे सिल्ली और दूसरा बद्रीनाथ धाम में शंख में जा छुपा। मान्यता है कि इसी वजह से आज भी बदरीनाथ धाम में शंख नहीं बजता है।  

सिल्ला गांव के आचार्य विश्वंभरदत्त नौटियाल और माहेश्वर पुरोहित बताते हैं कि जब भी साणेश्वर महाराज की दिवारा यात्रा का महायज्ञ होता है, तो कुमड़ी गांव से मां कुष्मांडा देवी को पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ ध्याण के रूप में आमंत्रित किया जाता है। देवी, स्वयं यज्ञकुंड को खोलती हैं और 18 दिनों तक महायज्ञ की सुरक्षा करती हैं।

कुमड़ी गांव में देवी का मूल मंदिर
आराध्य मां कूष्मांडा का मूल मंदिर जखोली ब्लॉक के सिलगढ़ पट्टी के कुमड़ी गांव में है। यहां देवी की प्राचीन अष्टधातु की अष्टभुजा मूर्ति स्थापित है। साथ ही प्रस्तर प्रतीक भी हैं। स्थानीय और आसपास के गांवों के लोग देवी दर्शनों को पहुंचते हैं। चैत्र व शारदीय नवरात्रों में यहां कूर्मासना स्त्रोत का पाठ होता है।
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