शरद पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक चंद्रमा पृथ्वी के सबसे करीब होता है। इन दिनों चंद्रमा से बरसने वाला अमृत धरती को अमरता रूपी आरोग्य और आनंद प्रदान करता है। शास्त्रों में वर्णन है कि धूलोक में सोमरूपी अमृत का भंडार है।
चांदनी में बैठने से सभी अंग पुष्ट होते हैं
चंद्रमा जब धरती के सबसे करीब होता है तो उसकी किरणें धूलोक का अमृत धरती पर लाती हैं। किरणों के आगमन का चरमोत्कर्ष शरद पूर्णिमा की रात्रि में होता है। इन दिनों चंद्रमा की धरती से दूरी सबसे कम होती है, इसलिए चांदनी में चंद्रमा को देखने से नेत्र ज्योति बढ़ती है। पूर्णिमा की रात्रि में चांदनी में बैठने से सभी अंग पुष्ट होते हैं।
शरद पूर्णिमा को कौमदि पूर्णिमा, कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नामों से भी पुकारा जाता है। अमृत प्रदायिनी शरद पूर्णिमा की रात्रि में यदि गंगा, यमुना, गोदावरी आदि पावन नदियों के तट पर चांदनी में बैठें तो जल के निकट अमरत्व का प्रभाव दोगुना हो जाता है।