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भाजपा के सिर से उतरा सतपाल महाराज का खुमार

Mon, 12 May 2014 02:51 PM IST
अजित सिंह राठी/अमर उजाला, देहरादून
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पौड़ी से कांग्रेस सांसद सतपाल महाराज ने जब भाजपा ज्वाइन करने का धमाका किया तो लगा कि अब प्रदेश में नई राजनीतिक क्रांति की शुरूआत हो रही है और हरीश रावत की सरकार को कई तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा।
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लेकिन समय बीतने के साथ ही यह भ्रम भी टूटता दिख रहा है। क्योंकि जब महाराज भाजपा में आए थे तब कई विधायकों के साथ आने का शोर मचा था, लेकिन गाड़ी आगे नहीं बढ़ी।

सतपाल महाराज प्रदेश के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं, हालांकि पौड़ी संसदीय सीट के उन्हें बीसी खंडूड़ी ने कई बार धूल चटा रखी है।

देश में उनके अनुयायियों की संख्या लाखों में

केंद्र में राज्यमंत्री रह चुके महाराज के बारे में कहा जाता है कि देश में उनके अनुयायियों की संख्या लाखों में है, लेकिन ये सब बाहरी राज्यों में हैं।

जब राजनाथ सिंह के समक्ष महाराज ने दिल्ली में भाजपा ज्वाइन की तो यह अहसास कराया गया कि कांग्रेस के तीन से चार विधायक इस्तीफा देकर उनके साथ आ जाएंगे।

लेकिन अभी तक उनकी पत्नी और राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री अमृता रावत ही कोई निर्णय नहीं ले सकी।

धीर-धीरे उतर रही महाराज के आने की खुमारी

इसके बाद महाराज के आने के बाद जो घमासान प्रदेश में शुरू हुआ वह खत्म होने की ओर है। अब भाजपा के भीतर ही महाराज को लेकर दो तरह की बाते होने लगी हैं।

वास्तव में महाराज भाजपा में आने के बाद एक भी ऐसा ट्रेलर नहीं दिखा सके, जिससे लगे कि उनके कैंप में दमदार नेता मौजूद हैं।

यही वजह है कि महाराज के आने की खुमारी अब धीर धीरे उतर रही है। क्योंकि यह चर्चा भी है कि उनके खांटी समर्थक राजेंद्र भंडारी व अनुसुईया प्रसाद मैखुरी ने किसी तरह का जोखिम लेने से मना कर दिया है।

एक खेमा महाराज के आने से खुश नहीं

अब महाराज केवल अपनी पत्नी को ही इस्तीफा दिलाकर भाजपा के टिकट पर उप-चुनाव लड़ाने का रिस्क लेंगे या नहीं। वैसे भी अंदर ही अंदर प्रदेश भाजपा का एक खेमा महाराज के आने से बहुत खुश नहीं है।

भाजपाइयों का मानना है कि जो भी महाराज को भविष्य में जो भी मिलेगा वह पार्टी के उन नेताओं का हक है जो सालों से पार्टी के लिए मर खप रहे हैं।
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नतीजों के बाद की परिस्थिति पर भाजपा की नजर

लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद की परिस्थितियों के मद्देनजर भाजपा के भीतर भी मंथन हो रहा है। नए सिरे से रणनीति बनाई जा रही है।

नतीजों के बाद का राजनीतिक परिदृश्य देखने को सभी बेताब है। भाजपा नेताओं को उम्मीद हैं कि नतीजे उनकी पार्टी के पक्ष में आएंगे और कांग्रेस के भीतर रार बढ़ेगी।

इस सत्ता संग्राम के बाद राज्य में जो भी परिस्थितियां उभरेंगी उन्हें अपने पक्ष में मोड़ने के लिए भाजपा कोई कसर बारी रखने के मूड में नहीं है।

लेकिन अब देखना यही है कि इन परिस्थितियों में कांग्रेस का क्या मैनेजमेंट रहता है और भाजपा आक्रामक रुख अपनाती है या फिर पीडीएफ को मोहरा बनाकर आगे बढ़ती है।

उम्मीद की जा रही है कि भाजपा ऐसी रणनीति तैयार करेगी जो कि पीडीएफ का इस्तेमाल भी हो जाए और उसकी (भाजपा) बदनामी भी ना हो। इसलिए भाजपा का पूरा तंत्र नतीजों के बाद सूबे की सियासत को लेकर काफी सतर्क हो गई है।
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