कुष्ठ रोगियों, तपेदिक (टीबी) के मरीजों और मानसिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए रैफल रायडर चैशायर इंटरनेशनल सेंटर किसी जन्नत से कम नहीं हैं।
जिनको कहीं और ढंग से इलाज नहीं मिलता या जिन्हें समाज ठुकरा देता है, ऐसे लोगों को सेंटर में आश्रय के साथ ही बेहतर इलाज भी दिया जाता है। यहां इनको प्रगति के सारे मौके भी मिलते हैं। देहरादून के मोहिनी रोड, डालनवाला स्थित टीबी अस्पताल और केयर सेंटर ने लाखों तपेदिक मरीजों के आसरा, जिंदगी और इसे जीने का नया हौसला भी दिया है।
1966 में रैफल परिसर में तपेदिक सेंटर स्थापित हुआ था। तब यहां दस बेड होते थे। लेकिन अब यहां 20 बेड हैं और तपेदिक मरीजों का निशुल्क व संपूर्ण इलाज होता है। पिछले पचास सालों में रैफल टीबी अस्पताल लाखों तपेदिक मरीजों को नवजीवन दे चुका है। जब डॉट्स प्रोग्राम नहीं था तो देश के कोने-कोने से लोग मुफ्त इलाज के लिए यहां आते थे।
देशव्यापी डॉट्स प्रोग्राम (डायरेक्ट आब्सर्व्ड थेरेपी) शुरू होने पर यह रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरोक्लासौसिस प्रोग्राम का वितरण दवा सेंटर बन गया। रैफल के चेयरमैन एयर मार्शल (अप्रा) बीडी जयाल कहते हैं कि रैफल विविध क्षेत्रों में काम कर रहा है। लेकिन तपेदिक मरीजों के लिए हम अनूठे ढंग से काम कर रहे हैं।
85 वर्षीय कर्नल (रिटायर्ड) डॉ. जेपी गुप्ता देश के नामी तपेदिक विशेषज्ञों (टीबी एक्सपर्ट) में से एक हैं। सेना को लंबी सेवाएं देने के साथ ही वह एएफएमसी के सहायक प्रोफेसर भी रहे। रिटायरमेंट के बाद रैफल के तत्कालीन चेयरमैन जनरल रणबीर बख्शी से प्रेरित होकर इस संस्था से जुड़ गए। वह रैफल के डायरेक्टर मेडिसन हैं और हजारों तपेदिक पीड़ितों का इलाज कर चुके हैं। यहां भर्ती मरीजों का रहना, खाना और इलाज निशुल्क होता है।
रैफल रायडर चैशायर का संक्षिप्त इतिहास
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- फोटो : amar ujala
मानवतावादी ग्रुप कैप्टन लार्ड लियोनार्ड चैशायर और उनकी पत्नी बैरोनेस रायडर ने 1959 में संस्था की स्थापना की। 23 एकड़ में फैले इसके परिसर में इस दंपति ने अद्भुत काम किया। शुरुआत कुष्ठ रोगियों के उपचार से हुई। ठीक होने के बाद उनको आसरा भी प्रदान कराया गया। साथ ही मानसिक रूप से कमजोर बच्चों को भी आसरा दिया जाने लगा। इसके बाद तपेदिक मरीजों के मुकम्मल इलाज की व्यवस्था भी यहां हो गई।
शिव सदन : परिसर में उपचारित कुष्ठ रोगियों के लिए आवासीय कालोनी है। ये लोग यहां रहने के साथ ही उत्पादक गतिविधियों में भी शामिल हैं। बुनाई, कढ़ाई, इलेक्ट्रीशियन, प्लंबिंग, बढ़ईगिरी, मालीगिरी समेत दूसरे हुनरमंद कार्य में ये लोग शामिल हैं। वित्तीय तौर पर ये लोग स्वावलंबी हैं।
लिटिल व्हाइट हाउस : छह से 18 वर्ष के कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों के बच्चे यहां रहते हैं। रैफल इनका संरक्षक है और इनके शिक्षण आदि की सारी व्यवस्था संस्था ही करती है। साथ ही उन्हें रोजगारपरक तालीम भी दी जाती है। भविष्य में इन्हें रोजगार प्रदान करने के लिए भी प्रयास रैफल की तरफ से ही की जाती है।
आवास सेंटर : मानसिक रूप से कमजोर बच्चों और बड़ी उम्र के लोगों के लिए आवासीय कालोनी है। यहां इनके जीवन के सभी आयामों का न सिर्फ ध्यान रखा जाता है, बल्कि इनकी तरक्की के सारे इंतजाम हैं। शिक्षा और चिकित्सा (सतत उपचार) पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
डे सेंटर : डे सेंटर में रैफल में रहने वाले और आसपास निवास करने वाले जरूरतमंद लोगों को प्रशिक्षण दिया जाता है। स्पीच थेरेपिस्ट, फिजियोथेरेपिस्ट की मदद से उनकी सेहत सुधारी जाती है। यहां इन्हें ब्लाक प्रिंटिंग समेत दूसरे रोजगार परक तालीम जाती है।