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मुजफ्फरनगर कांड बरसी: राज्य गठन के 20 साल बाद भी बुनियादी सुविधाओं को तरस गया है उत्तराखंड

Sat, 02 Oct 2021 11:12 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal कैलाश पाठक, अमर उजाला, हल्द्वानी

सार

राज्य आंदोलनकारी पीसी तिवारी का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों व देश के तमाम भागों से अलग राज्य की मांग को लेकर दिल्ली जा रहे प्रदर्शनकारियों का सोची समझी रणनीति के तहत 27 साल पहले एक-दो अक्तूबर की रात मुजफ्फरनगर में बर्बर दमन किया गया था।
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protest - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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राज्य गठन के 20 साल बाद भी उत्तराखंडवासी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस गए हैं। राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि जिस भयमुक्त पर्वतीय राज्य की कल्पना शहीदों ने की थी, वह सब धराशायी हो गया है। राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के लिए आज भी पलायन जारी है। राज्य गठन से पहले एकतरफा पलायन दिल्ली मुंबई के लिए होता था। राज्य गठन के बाद दोहरा पलायन हो गया है। एक राज्य के बाहर और एक राज्य के भीतर। 

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उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष और राज्य आंदोलनकारी पीसी तिवारी का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों व देश के तमाम भागों से अलग राज्य की मांग को लेकर दिल्ली जा रहे प्रदर्शनकारियों का सोची समझी रणनीति के तहत 27 साल पहले एक-दो अक्तूबर की रात मुजफ्फरनगर में बर्बर दमन किया गया। कानून के रखवाले कहे जाने पुलिस कर्मियों ने महिलाओं की इज्जत लूटी।

निर्दोष लोगों पर गोलियां चलाई गई उन पर झूठे मुकदमे बनाए गए, जिसमें मुजफ्फरनगर में आठ लोग शहीद हुए। दिल्ली में आंसू गैस के गोले छोड़े गए, लाठीचार्ज किया और सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार भी किया गया। इस तरह 42 शहादतों और लंबी लड़ाई के बाद एक आधा अधूरा उत्तराखंड हमें प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड राज्य को बने अब 20 वर्ष हो गए हैं लेकिन मुजफ्फरनगर के इस वीभत्स कांड के खलनायकों को आज तक दंडित नहीं किया जा सका।
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बेरोजगारी चरम पर

प्रमुख राज्य आंदोलनकारी और राज्य की मांग पर विधानसभा में पर्चे फेंकने वाले मोहन पाठक का कहना है कि वह इन दिनों पर्वतीय क्षेत्र के अस्पतालों की बदहाल स्थिति का जायजा ले रहे हैं। बाड़ेछीना के नजदीक पहुंचे मोहन पाठक ने बताया कि पर्वतीय क्षेत्र में अस्पताल खंडहर बने हुए हैं। इनमें कोई सुविधा नहीं है। शिक्षा, रोजगार के लिए लगातार पलायन हो रहा है।

महिलाओं की सुरक्षा और अपराधों पर लगाम नहीं लग पाई है। पानी, बिजली, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं मयस्सर नहीं हैं। राज्य का भू-कानून नहीं बन पाया है। शहीदों के सपनों को कांग्रेस और भाजपा सरकारों ने तार-तार किया है। राज्य आंदोलनकारी हुकुम सिंह कुंवर कहते हैं कि शहीदों के सपनों की स्थायी राजधानी गैरसैंण सपना ही बनकर रह गई है।

बेरोजगारी चरम पर है। शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते पहाड़ के लोग पलायन को मजबूर हैं। पहाड़ खाली हो गए हैं। खेत बंजर हैं, आबादी क्षेत्रों में जंगली जानवरों का आतंक है। पहले दिल्ली, मुंबई के लिए पलायन होता था आज दिल्ली, मुंबई के साथ ही राज्य के भीतर देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर की ओर लोग पलायन कर रहे हैं। पर्वतीय राज्य की आवधारणा खोखली साबित हुई है। मुजफ्फरनगर कांड को सरकारों ने भुला दिया है। पहाड़ों की दिनपर दिन दुर्दशा होती जा रही है। 
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