नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा एक कुशल राजनीतिज्ञ होने के साथ ही सामाजिक सेवा के क्षेत्र में भी अनूठी मिसाल पेश की है।
सांसद टम्टा उत्तराखंड के जंगलों को बचाने के लिए शुरू किए गए चिपको आंदोलन के अलावा राज्य के युवाओं को शराबखोरी जैसी कुप्रवत्तियों से बचाने के लिए ‘नशा नहीं रोजगार दो’ जैसे आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। उन्हें हिमालयी राज्यों के विकास के प्रबल पक्षधर के रूप में भी जाना जाता है।
टम्टा के प्रयासों से ही पूर्व में केंद्र सरकार ने 11 हिमालयी राज्यों के विकास के लिए एक समिति का गठन भी किया था। संयोग ऐसा रहा कि समिति के सुझावों को लागू नहीं किया जा सका। 16 जून 1958 को कुमाऊं क्षेत्र के बागेश्वर जिले के गांव लोब में जन्मे सांसद प्रदीप टम्टा का जीवन गांव में ही बीता।
कुमाऊं विवि से परास्नातक, एलएलबी और बीएड की पढ़ाई की। राजनीति में उनकी दिलचस्पी शुरू से ही रही। राज्य गठन के बाद साल 2002 में वह पहली बार विधानसभा चुनाव जीतकर सदन पहुंचे। उनकी राजनीतिक सूझबूझ को देखते हुए उन्हें उत्तराखंड उद्योग परिषद का उपाध्यक्ष मनोनीत किया गया। सांसद प्रदीप टम्टा के राजनीतिक जीवन में बदलाव उस समय आया जब वह साल 2009 में हुए 15वीं लोकसभा चुनाव में अल्मोड़ा संसदीय सीट से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।
सांसद प्रदीप टम्टा ने संसद में उत्तराखंड समेत देश के सभी 11 हिमालयी राज्यों के विकास का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। टम्टा के प्रयासों का ही परिणाम रहा कि यूपीए सरकार ने चतुर्वेदी समिति का गठन किया। समिति ने अपनी रिपोर्ट भी केंद्र को सौंप दी जिसमें हिमालयी राज्यों के विकास से जुड़े तमाम सुझाव दिए गए। लेकिन, संयोगवश चतुर्वेदी समिति की रिपोर्ट को लागू नहीं कराया जा सका।
उन्हें पूर्व में केंद्र सरकार के वन पर्यावरण और साइंस एंड टेक्नोलॉजी विभाग की संसदीय कमेटी में शामिल किया गया। अब जबकि सांसद प्रदीप टम्टा एक बार फिर राज्यसभा चुनाव जीतकर संसद के ऊपरी सदन में पहुंचे तो राज्य के विकास की रफ्तार को और गति मिलने की उम्मीद जगी है, जिसका संकेत उन्होंने दे दिया है। सांसद टम्टा ने साफ शब्दों में कहा है कि उत्तराखंड समेत देश के सभी 11 हिमालयी राज्यों के विकास का मुद्दा वह राज्यसभा में प्रमुखता से उठाएंगे।