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मसूरी और लक्ष्मीबाई का ऑस्ट्रेलियाई 'कनेक्शन'

Fri, 21 Nov 2014 01:42 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, मसूरी, देहरादून
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ऑस्ट्रेलिया के हालिया दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ऐतिहासिक बैरिस्टर जॉन लैंग के जिक्र से डेढ़ सदी बाद यह नाम देश-दुनिया की जुबान पर आ गया है।
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लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि लैंग का नाम भारत में तब चर्चाओं में आया था, जब प्रख्यात लेखक रस्किन बांड ने उनकी कब्र मसूरी में खोजी थी। अब पीएम मोदी के जिक्र के बाद बांड भी मानते हैं कि इससे दोनों देशों के रिश्ते मजबूत होंगे।

पीएम मोदी ने ऑस्ट्रेलिया में मूलत: ऑस्ट्रेलिया निवासी लैंग के भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की अगुआ रहीं रानी लक्ष्मीबाई की मदद करने वाले बैरिस्टर के तौर पर याद की। ऑस्ट्रेलिया में लैंग अपनी किताबों की वजह से पहले से लोकप्रिय थे, लेकिन भारत में उन्हें कम ही लोग जानते थे।
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उनका नाम 1964 में सुर्खियों में आया, जब रस्किन बांड ने मसूरी की कैमल्स बैक रोड पर लैंग की कब्र तलाशी। बांड बताते हैं कि लैंग का ऐतिहासिक जिक्र आता था, लेकिन यह पुष्ट नहीं था कि वह मसूरी में रहे थे।

ऑस्ट्रेलिया के पहले उपन्यासकार

बांड ने बताया कि 1964 में लैंग की सौवीं पुण्यतिथि पर ऑस्ट्रेलिया से एक परिचित ने लैंग के कुछ दस्तावेज भेजे, इसके बाद उन्होंने खोज शुरू की। इसके बाद मसूरी की वादियों में चिर निद्रा में सो रहे लैंग की कब्र के साथ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान की सचाई सामने आ गई।

वह सिर्फ वकील नहीं, लेखक और अपने दौर के नामी पत्रकार भी थे। बांड कहते हैं कि लैंग को वह सम्मान मिलना चाहिए, जिसके वह हकदार थे। उधर, प्रख्यात लेखक प्रो. गणेश शैली कहते हैं कि पीएम के कदम से भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंध प्रगाढ़ होने की उम्मीद है।

ऑस्ट्रेलिया में जॉन लैंग को देश के पहले उपन्यासकार के तौर पर जाना जाता है। लैंग ने अंग्रेजी उपन्यास द वेदरबाइज, टू क्लेवर बाई हाफ, टू मच अलाइक, द फोर्जर्स वाइफ, कैप्टन मैकडोनाल्ड, द सीक्रेट पुलिस, ट्रू स्टोरीज आफ द अर्ली डेज आफ ऑस्ट्रेलिया, द एक्स वाइफ, माई फ्रेंड्स वाइफ का लेखन किया था। उनके निधन के बाद ये उपन्यास बार-बार प्रकाशित हुए और पाठकों द्वारा पसंद किए जाते रहे।

हिमालय के कद्रदान थे
बांड बताते हैं कि जॉन लैंग को हिमालय और इसकी शिवालिक श्रेणियों की सुंदरता काफी भाती थी। मेरठ में गर्मी की वजह से जब वह बीमार रहने लगे तो उन्होंने मसूरी का रुख किया। इसके बाद वे यहीं बस गए और शादी भी कर ली। वह मसूरी में पिक्चर पैलेस के पास हिमालय क्लब में रहते थे। यहीं उन्होंने अंतिम सांस ली।
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लैंग की जिंदगी

जन्म: 19 दिसंबर 1816, सिडनी ऑस्ट्रेलिया
शिक्षा: प्रारंभिक शिक्षा सिडनी में, 1837 में इंग्लैंड से बैरिस्टरी
सामाजिक आंदोलन : 1830 में सिडनी विद्रोह में ब्रिटिश शासकों के खिलाफ आवाज उठाने पर देश निकाला
भारत पहुंचे: 1837 में
वकालत: 1841 से 1845 तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अंग्रेजों द्वारा गरीब भारतीयों पर थोपे गए मुकदमे लड़े
1856 में रानी लक्ष्मीबाई ने लार्ड डलहौजी की निस्संतान दंपति का राज छीनने की नीति के खिलाफ कोलकाता हाईकोर्ट में केस किया, जिसके लिए उन्होंने लैंग को चुना
पत्रकारिता: 1845 में कोलकाता में मफसिलाइट अखबार प्रारंभ किया, बाद में इसका मेरठ से प्रकाशन
मसूरी पहुंचे: रानी लक्ष्मीबाई का केस हारने, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1857 में रानी की मृत्युु के बाद 1858 में लैंग मसूरी आ गए
विवाह: 1861 में मसूरी में मारग्रेट वैटर से
निधन: 20 अगस्त 1864 (48 वर्ष की उम्र में)

धरोहर घोषित हो लैंग की कब्र
भारतीय इतिहास संकलन समिति ने बुधवार को आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में रानी लक्ष्मीबाई और जॉन लैंग को श्रद्धांजलि दी। उत्तरांचल विश्वविद्यालय में लॉ कालेज के सहायक प्रोफेसर डा. अनिल दीक्षित ने इंग्लैंड की सरकारी लाइब्रेरी में रखे रानी लक्ष्मीबाई के लिखे पत्र वापस लाने और मसूरी में जॉन लैंग की कब्र को संरक्षित कर राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा देने की मांग की। सुनील तिवारी, मनोज त्रिपाठी, रचना तिवारी, सुधीर तिवारी, गायत्री देवी, सुनील अग्रवाल, हीरा पंवार आदि मौजूद रहे।

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