भागीरथी और अलकनंदा नदी के संगम स्थल देवप्रयाग को संगम नगरी कहा जाता है। श्राद्ध पक्ष में देवप्रयाग में पितृकार्य और पिंडदान का विशेष महत्व है। यहां पड़ोसी देश नेपाल समेत देश के विभिन्न प्रदेशों से लोग अपने पितरों का तर्पण करने पहुंचते हैं।
श्रीराम ने देवप्रयाग में तप किया और विश्वेश्वर शिवलिंगम की स्थापना की
स्कंद पुराण के केदारखंड में उल्लेख है कि त्रेता युग में ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति के लिए श्रीराम ने देवप्रयाग में तप किया और विश्वेश्वर शिवलिंगम की स्थापना की। इस कारण यहां रघुनाथ मंदिर की स्थापना हुई। यहां श्रीराम के रूप में भगवान विष्णु की पूजा होती है।
डॉ. शैलेंद्र शास्त्री बताते हैं कि भगवान राम की इस तपस्थली में आज भी पितृ पक्ष में राजा दशरथ के तर्पण की परंपरा मुख्य पुजारी निभाते चले आ रहे हैं। आनंद रामायण में यह भी उल्लेख है कि भगवान राम ने यहां अपने पिता राजा दशरथ का पिंडदान किया था।
नेपाली भाषा के धर्मग्रंथ हिमवत्स खंड में लिखा गया है कि देवप्रयाग में पितरों के निमित पिंडदान व तर्पण का सर्वाधिक महत्व है। पंडित शुभ्रांशु जोशी बताते हैं कि गंगा (भागीरथी) को पितृ गंगा भी कहा जाता है।