विज्ञानियों ने धरती के अंदर घटते पानी पर चिंता व्यक्त की और किसानों ने खेती में पानी की किफायत के तरीके बता दिए।
पढ़ें, 'भगत सिंह कोश्यारी पर भारी पड़ेंगे एनडी तिवारी'
ये तरीके किसी विश्वविद्यालय के शोध केंद्र में तैयार नहीं किए गए थे। ये नई तकनीक खेतों की प्रयोगशाला में किसानों की अपनी दिमाग की उपज थी, जो बदलते माहौल में कारगर साबित हुई।
देहरादून में केंद्रीय मृदा एवं जल संरक्षण शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान और इंडियन एसोसिएशन आफ सॉइल एंड वॉटर कंजरवेशनिस्ट्स के बैनर तले इंस्टीट्यूट आफ इंजीनियर्स के सभागार में पानी की बचत पर सेमिनार का आयोजन किया गया।
पढ़ें, हिमालय में है औषधीय पौधों की भरमार
इस मौके पर विज्ञानियों ने सूखते भूगर्भ जलस्तर के संबंध में चिंता व्यक्त की। विज्ञानियों ने बताया कि पानी की कमी के कारण मिट्टी की क्वालिटी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
इस पर औगंद करनाल से आए किसान दीन बंधु शर्मा ने धान की खेती की नई तकनीक बताई। इसमें धान की नर्सरी तैयार करने के बाद रोपाई नहीं की जाती। सीधे धान की बोवाई होती है। भूमि का समतलीकरण किया जाता है।
पढ़ें, ...तो क्या पीडीएफ लगाएगी कांग्रेस की नैया पार
उन्होंने बताया कि धान की सीधी बोवाई से 20 से 30 प्रतिशत पानी की बचत हो जाती है। तीन सेमी गहराई में धान बोया जाता है। इसमें मेहनत कम पड़ती है। खर-पतवार पर नियंत्रण होता है।
पंचकुला हरियाणा के किसान गुरमेत सिंह ने सुखो माजरी क्षेत्र के संबंध में बताया। यहां पानी न होने से खेत बंजर रहते थे। पानी का संरक्षण हुआ तो क्षेत्र आबाद हो गया। कार्यक्रम के चेयरमैन वरिष्ठ कृषि विज्ञानी डॉ. केपी त्रिपाठी थे।