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राज्य की एजेंसियां तंगहाल, बाहरी मालामाल

Wed, 03 Sep 2014 11:20 AM IST
अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड में बाहरी संस्थाओं को काम दिए जाने से राज्य की कई इम्पैनल्ड एजेंसियां लड़खड़ा रही हैं। इनमें से कई तो बेरोजगारी की दौर से गुजर रही हैं।
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अवस्थापना विकास निगम की हालत तंग
खंडूड़ी सरकार ने बाहरी एजेंसियों से मुकाबले के लिए अवस्थापना विकास निगम गठित किया था लेकिन यह भी संकट में है। अलबत्ता सरकार बाहरी एजेंसियों को मालामाल करने में लगी हुई है। अवस्थापना विकास निगम की हालत तंग है।

सरकार खुद ही इस निगम को काम देने से परहेज करती है। निगम के पास बमुश्किल डेढ़ सौ करोड़ रुपए के काम हैं। उधर, केएमवीएन के पास भी साठ करोड़ के काम हैं। जीएमवीएन की हालत भी कुछ ऐसी है।
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पर्यटन का जिम्मा होने की वजह से फिलहाल ये दोनों निगमों के पास कुछ हद तक काम है। इनको थोड़ा बहुत काम एडीबी से मिल जाता है। केएमवीएन में तो जीएम कंस्ट्रक्शन की पोस्ट भी सालों से खाली पड़ी है। कृषि उत्पादन मंडी परिषद पांच करोड़ से कम लागत वाले काम ही करती है।

जबकि सहकारी डेयरी फेडरेशन को काम की तलाश है। गैरसैंण में विधानसभा के लिए फिलहाल लगभग सौ करोड़ का बजट है। लेकिन आवासीय कॉलोनी, दफ्तर, सचिवालय आदि मिलाकर यह प्रोजेक्ट 400 करोड़ तक पहुंचेगा। सरकार ने यह काम केंद्रीय एजेंसी एनबीसीसी को दे दिया है।

कुछ और भी काम इसी एजेंसी के पास हैं। इसके अलावा देहरादून महानगर में अरबों की लागत से बनने वाले ओवरब्रिज का जिम्मा ईपीआईएल को सौंपा गया है। यूपी राजकीय निर्माण निगम को सरकार के विभिन्न महकमों की तरफ से लगभग डेढ़ हजार करोड़ रुपए की धनराशि के काम आवंटित हैं।
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यहां तक कि राज्य सरकार के सैकड़ों करोड़ के भवनों के निर्माण के काम बीएसएनएल देख रहा है।

राज्य की निर्माण संस्थाएं
: अवस्थापना विकास निगम
: सिंचाई विभाग
: ग्रामीण अभियंत्रण सेवा
: लोक निर्माण विभाग
: पेयजल संसाधन व निर्माण निगम
: कुमाऊं मंडल विकास निगम
: गढ़वाल मंडल विकास निगम
: कृषि उत्पादन मंडी परिषद
: पंतनगर कृषि विवि
: उत्तराखंड सहकारी डेयरी फेडरेशन

सरकार को अपनी एजेंसियों को इतना मजबूत कर देना चाहिए जिससे यूपी की एजेंसियों की तर्ज पर दूसरे प्रदेशों में भी जाकर काम करे। लेकिन प्रदेश में अपनी ही एजेंसी की हालत खराब है। पीडब्लूडी का काम सड़क बनाने का है, लेकिन हमारे पास ब्रिज और बिल्डिंग के लिए अपनी कोई एजेंसी नहीं है, जबकि यूपी ब्रिज कारपोरेशन दूसरे देशों में भी ब्रिज बनाता है। अवस्थापना निगम का गठन हुआ तो पांच करोड़ रुपए मंजूर किए गए, मगर केवल एक करोड़ रुपया ही मिला। काम और धनराशि की व्यवस्था होगी तभी प्रदेश की एजेंसी उठकर खड़ी होंगी।
- सुनील कुमार मट्टू, अवस्थापना विकास निगम के पूर्व चेयरमैन
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