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उत्तराखंड के इस विभाग में घोटाला करने पर नहीं मिलती सजा!

Tue, 05 Jul 2016 03:09 PM IST
अनिल चन्दोला/ अमर उजाला, देहरादून
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- फोटो : demo pic
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पहले घोटाले दर घोटाले, फिर जांच दर जांच और अंत में पूरा मामला फाइलों में जकड़कर भ्रष्ट तंत्र की अंधेरी कोठरी में गुम। करोड़ों रुपये का गड़बड़झाला करने वाले वही अधिकारी शान से अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठकर हुक्म सुना रहे हैं।
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यह प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे की तस्वीर है, जहां घोटालों में संलिप्तता पाए जाने के बावजूद किसी पर कार्रवाई नहीं होती। यही कारण है कि विभाग में अधिकारी बेखौफ होकर हर माह एक नए कारनामे को अंजाम दे रहे हैं। 

स्वास्थ्य विभाग में ऊपर से नीचे तक फैले भ्रष्टाचार को इन उदाहरणों के जरिये समझा जा सकता है। मसलन, वर्ष 2009 में करीब 12 करोड़ के एनआरएचएम दवा खरीद घोटाले में पूर्व डीजी आशा माथुर सहित 18 अधिकारी और कर्मचारी दोषी पाए गए।
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विभागीय जांच के अलावा दो आईएएस स्तर के अधिकारियों ने भी मामले की जांच की। लोकायुक्त के आदेश पर हुई जांच में दोषी चिह्नित कर रिकवरी की संस्तुति की गई, बावजूद इसके किसी भी अधिकारी का बाल भी बांका नहीं हुआ। अब मामला सीबीआई को जांच के लिए भेजा गया है।

स्वास्थ्य विभाग का टैक्सी बिल घोटाला

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इसी तरह स्वास्थ्य विभाग का टैक्सी बिल घोटाला लंबे समय तक सुर्खियों में बना रहा, मगर कार्रवाई के नाम पर अभी तक कोई उपलब्धि नहीं है। यह वर्ष 2009 से 2013 के बीच की घटना है। फर्जी टैक्सी बिल घोटाले के मामले में हुई विभागीय जांच के अलावा दो आईएएस अफसरों ने जांच में 17 सीएमओ और सीएमएस स्तर के अधिकारियों को दोषी पाया था।

करीब तीन करोड़ रुपये की गड़बड़ी जांच में पकड़ी गई। वर्ष 2015 में एफआईआर तक दर्ज हुई लेकिन अभी तक न तो रिकवरी हुई न गिरफ्तारी। जांच में दोषी पाए गए अधिकांश अधिकारी आज भी बड़े पदों पर काम कर रहे हैं, जबकि इसी मामले में अब एक ओर जांच चल रही है।

कुछ इसी तर्ज पर  सीएमओ कार्यालय देहरादून में जिला योजना के तहत करीब दो करोड़ रुपये की खरीद हुई। इस मामले की जांच रिपोर्ट में बड़े स्तर पर वित्तीय अनियमितता की पुष्टि हुई। सीएमओ कार्यालय ने ऐसे सामान की खरीद की, जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। मई में जांच रिपोर्ट महानिदेशालय को भेजी गई, जो आज तक दबी हुई है।

इसी तरह दून अस्पताल में करीब तीन करोड़ रुपये की दवाओं की एलपी के मामले में किसी के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई, जबकि इस मामले की जांच में 60 से अधिक डॉक्टर दोषी पाए गए हैं। जांच रिपोर्ट के अनुसार डॉक्टरों ने तमाम नियम-कानूनों और दिशा-निर्देशों को बार-बार दरकिनार करते हुए ब्रांडेड दवाओं की एलपी की। जांच रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हुई है।

प्रदेश की करीब 12 हजार आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों के लिए विभाग ने साड़ियां खरीदी। सैंपलिंग के समय जो साड़ियां दिखाई गई, उनके बजाय घटिया क्वालिटी की साड़ियां सप्लाई कर दी गईं। जिलों में साड़ियां पहुंचने पर घोटाले का खुलासा हुआ। इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
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संविदा पर भर्ती को लेकर भी खेल

supreme court
स्वास्थ्य विभाग में संविदा पर भर्ती को लेकर भी खेल चलता ही रहता है। वर्ष 2013 में देहरादून एएनएम भर्ती घोटाला सामने आया। लगभग पचास एएनएम की नियुक्ति शासनादेश के बिना कर दी गई। शासन स्तर पर हुई जांच में एक सीएमओ डॉ. गुरपाल सिंह और प्रशासनिक अधिकारी सुशील जोशी जांच में दोषी पाए गए।

सरकार ने दोनों अधिकारियों को निलंबित तो किया, लेकिन मामले में अभी तक की ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसी वर्ष 2013 में टिहरी में 52 संविदा कर्मियों की भर्ती में भी घोटाला हुआ। मामले की प्रारंभिक विभागीय जांच में तत्कालीन सीएमओ एसके अग्रवाल दोषी पाए गए, लेकिन मामले में कार्रवाई अभी तक विचाराधीन है। पूछने पर आला अधिकारियों का रटा-रटाया जवाब है, मामला विचाराधीन है।

यह तो केवल बानगी भर है। ऐसे तमाम घोटाले और अनियमितताएं हैं, जो अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाई। जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने के लिए मिले लाखों-करोड़ों रुपये भ्रष्ट अधिकारी चट कर गए। भ्रष्टाचार के मामलों में जांच तो होती है लेकिन कार्रवाई नहीं। रिपोर्ट महानिदेशालय से शासन तक पहुंचने में कई माह का समय लगा देती है। किसी तरह शासन तक पहुंचने वाली रिपोर्ट वहीं दबकर रह जाती है। इससे विभाग में भ्रष्टाचारियों के हौसले बुलंद हैं।

भ्रष्टाचार से संबंधित अधिकांश मामलों में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया जारी है। कुछ मामलों में जांच अंतिम स्तर पर है, जिसमें कड़ी कार्रवाई होना तय है। कुछ मामलों में पहले हुई जांच में कमियां मिलने के बाद नए सिरे जांच गतिमान है। 
- ओमप्रकाश, प्रमुख सचिव, स्वास्थ्य

Publised By : Nirmala Suyal
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