लगता है कि प्रदेश में मांस बेचने वालों को कायदे कानून ताक पर रखने की खुली छूट मिली हुई है। कम से कम नगर निगमों, पालिकाओं और नगर पंचायतों का हाल तो यही कह रहा है।
निकायों को नियमों की जानकारी नहीं
सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी से इस बात का भी खुलासा हुआ कि निकायों को नियमों की जानकारी नही है और न ही इनकी तरफ से कोई कोशिश होती है कि मांस बिक्री की जांच ही की जाए।
राज्य सूचना आयोग ने अब शहरी विकास निदेशालय और पंचायत निदेशालय को पार्टी बनाते हुए 17 फरवरी तक रिपोर्ट देने को कहा है।
आरटीआई से मिली जानकारी
सितारगंज निवासी जाफर मालिक ने नगर पालिका सितारगंज से जानकारी मांगी थी कि मांस विक्रेताओं के लिए क्या-क्या कायदे कानून हैं और इनका पालन किस तरह से कराया जाता है।
नगर पालिका ने तो साफ ही कह दिया कि नगर पालिका क्षेत्र में कोई पशु वधशाला नहीं है और न ही कोई कर्मचारी इसके लिए नियुक्त है जो इस तरह के मामलों की जांच करे।
पालिका ने यह भी कहा कि स्पष्ट शर्त और कायदे कानून न होने के कारण पालिका ने अपने ही स्तर से नियमों को बनाते हुए मांस विक्रेताओं को लाइसेंस जारी किया है।
सूचना आयुक्त ने मांगी रिपोर्ट
राज्य सूचना आयुक्त विनोद नौटियाल ने इस पर गहरी नाराजगी जताई। आयुक्त ने कहा कि नियमों के अभाव में लोगों की सेहत से खिलवाड़ की आशंका है।
आयुक्त ने शहरी विकास निदेशालय और पंचायत राज निदेशालय को इस मामले में पार्टी बनाते हुए दोनों निदेशालय को प्रदेश के सभी क्षेत्रों की स्पष्ट रिपोर्ट 17 फरवरी तक देने को कहा है। इस मामले में 17 फरवरी को सुनवाई होगी।