नंदा अब अनिष्ट से दूर रखने वाली देवी ही नहीं बल्कि देवों की इस भूमि को एक सूत्र में पिरोने वाली आध्यात्मिक शक्ति का रूप ले रही है। नंदकेशरी में भगवती ने इसकी एक झलक भी दिखाई।
कई रूपों में सामने आई भगवती
अनेक रूपों में जानी जाने वाली भगवती अब एक रूप में है। सब कुछ नंदा मय है। ऊंचे बुग्यालों की ओर बढ़ने से पहले नंदा का यह रूप अब वाण में सामने आएगा। नौटी से लेकर नंदकेशरी तक के सफर में भगवती कई रूपों में सामने आई।
राजराजेश्वरी देवी की छंतोंली कुलस्यारी तक देवता मानी गई। यहां तक लोग यही कहते रहे कि देवता आ रहे हैं। शायद यह इस क्षेत्र में पुरुष प्रधान समाज की ओर संकेत करता हो। पर कुलस्यारी के आगे नंदा भगवती है। अब यह नारी शक्ति का रूप है।
भगवती की इस शक्ति के आगे अब सब नतमस्तक है। नंदा अब प्रकृतिमय है। हिमालय की ऊंची चोटियों की ओर बढ़ रही नंदा का यह स्वरूप हिमालय की प्रकृति से भी मेल खाता है। गढ़वाल और कुमाऊं का इतिहास परस्पर विरोध का भी रहा है।
इन दो आध्यात्मिक शक्तियों का मिलन नई बात भी नहीं मानी जाती। कोठी के उत्तम बडियारी के मुताबिक 1968 की राजजात में नंदकेशरी में राज छंतौलियों के साथ केवल नंदा की डोली ही थी। इनका मिलन भी नंदकेशरी में पहुंचने के बाद अगली सुबह हुआ था।
उत्तम बडियारी उस समय मंदिर से सटे स्कूल में पढ़ रहे थे। पर अब जात का स्वरूप बदल गया है। 2000 की जात में 75 साल बाद कुमाऊं की छंतोलियां शामिल हुई थीं। मंगलवार को कुमाऊं से आने वाले नंदा भक्तों का ऐसा तांता लगा कि नंदकेशरी में पांव रखने तक के लिए जगह नहीं बची।
नंदकेशरी पुल के दोनों ओर करीब गाड़ियां ही गाड़ियां नजर आईं। मानव सैलाब में गढ़वाल और कुमाऊं की संस्कृतियों का अजब संगम। कहते हैं कि पहाड़ में हर दो कोस पर पानी और पांच कोस पर बोली बदल जाती है। ऐसे में नंदकेशरी में बोलियों, वेश भूषा की इंद्रधनुषी छटा भी बिखर गई।
अब यात्रा में कई बोली, वेश भूषा और मान्यताओं का संगम है। पहाड़ की छोटी-छोटी नदियां एक विराट नदी का रूप ले रही हैं। यह नदी नीचे उतरने के बजाय हिमालय की ओर बढ़ रही है। नंदा शिव में एकाकार होने के लिए अब बेकरार है।
पिछली बार का सबसे छोटा यात्री इस बार भी शामिल
पिछली बार सबसे छोटी उम्र के यात्री के रूप में शामिल वरुण कपूर अब युवा हो चुके हैं। वे इस बार भी इस यात्रा को दोहराने के लिए निकल पड़े हैं। 2002 में सबसे कम उम्र (12 वर्ष) का यात्री होने के कारण वरुण को नंदादेवी राजजात समिति की ओर से सम्मानित भी किया गया था।
वरुण कपूर परिवार की तीसरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हुए नंदा देवी राजजात में शामिल हो रहा है। 14 साल बाद वरुण अब 26 वर्षीय युवक हैं।
व्यावसायिक व्यस्तताओं के चलते इस बार उन्होंने अपनी यात्रा नंदकेशरी से शुरू करने के लिए गए हैं। वरुण ने बताया कि नंदा और इस आध्यात्मिक यात्रा के लिए उनके परिवार में बड़ी श्रद्धा है। उनके दादा और पिता भी राजजात यात्रा में शामिल हो चुके हैं। अब इस परंपरा को वरुण और उनके भाई राहुल आगे बढ़ा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि पिछली बार की मुश्किल यात्रा पिता अरुण कपूर के हौसले के कारण पूरा कर पाए थे। तब भी यात्रा के दौरान मौसम की मुश्किलें पेश आईं, लेकिन श्रद्धा और रोमांच के आगे सब फीका रहा।
बड़े भाई राहुल ने बताया कि पिछली बार 12 साल के वरुण को कोई परेशानी नहीं हुई। उसे देखकर अन्य लोगों को भी हौसला मिला। हालांकि वरुण को लेकर शुरुआत में सभी लोग आशंकित थे। मगर नन्हें वरुण ने तब सबको गलत साबित करते हुए यात्रा पूरी की।
नंदा से मिलने को उठाया जोखिम
जून 2013 को पिंडर उफनाई थी तो नंदकेसरी से करीब दर्जन भर गांवों को जोड़ने वाला चेपड़ों पुल भी बह गया था। एक साल बाद भी पुल न बनने से लोगों को नंदकेसरी में नंदा से मिलने के लिए या तो जान जोखिम में डाल कर ट्राली का सहारा लेना पड़ रहा है या फिर 16 किमी के कच्चे रास्ते का सहारा लेना पड़ रहा है।
चेपड़ों के ठीक सामने पिंडर के उस तरफ त्रिकोट, सेरा, विजयपुर, अस्सों, बुडजोला, जोला, जटेरा, कल्याणी, सिमसारी आदि एक दर्जन से अधिक गांव हैँ। एक ही बिरादरी के लोगों का गांव चेपड़ों भी है और त्रिकोट भी। चेपड़ों में बना पुल बहा था तो इनके बीच संपर्क का रास्ता या तो ट्राली है या फिर नंद केसरी पुल।
पर इस पुल से होकर नंदकेसरी तक पहुंचने के लिए इन्हें 16 किमी की अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ी। दोनो किनारों को जोड़ने वाला एक और पुल कल्याणी पर पिछले आठ साल से बन ही नहीं पाया है।