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'प्रयोगशाला' में मुसलिमों पर हो रहा एक्सपेरिमेंट

Wed, 23 Apr 2014 09:43 AM IST
अजित सिंह/ अमर उजाला, देहरादून
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पिछले डेढ़ दशक की चुनावी जंग में खासतौर पर दो मैदानी जिले मुसलिम राजनीति की प्रयोगशाला बन गए हैं। पूरे समय अपने अस्तित्व के जमानदार की तलाश में जूझता मुसलमान चुनाव से ऐन पहले दुविधा में पड़ जाता है।
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दुविधा के घेरे में मुसलिम मतदाता
वह केवल वोट का मुद्दा बनकर रह जाता है और विकास व कल्याण के मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं। इसलिए पसंद और लक्ष्य तय होते हुए भी मुसलिम मतदाता दुविधा के घेरे में फंसा रहता है।

मुसलमानों की रहनुमा बनने का दावा करने वाली सपा से भी उत्तराखंड में यह समुदाय निराश हुआ। उसे उम्मीद थी कि हरिद्वार से सपा का सांसद जिताकर उनकी समस्याएं कुछ कम होगी।
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लेकिन सपा कसौटी पर खरी नहीं उतरी। इसके बाद विधानसभा चुनाव हुए तो मुसलिम समाज का रुख बसपा की तरफ बढ़ा।

मगर वहां भी सपने पूरे नहीं हुए तो 2009 के लोकसभा चुनाव में मुसलिम समुदाय ने एकजुट होकर दो मैदानी सीटों नैनीताल व हरिद्वार और आधी मैदानी टिहरी सीट पर कांग्रेस को जिताने में अहम भूमिका निभाई।

कांग्रेस हो सकती है इस समुदाय की पहली पसंद
मगर 2012 का विधानसभा चुनाव आते आते मुसलिम बाहुल्य इलाकों में सपा साफ हो गई, कांग्रेस ने बामुश्किल इज्जत बचाई, बसपा ने सीटे गवांई और भाजपा को अप्रत्याशित सफलता मिली।

कुल मिलाकर सपा, बसपा, कांग्रेस मुसलिम मतों के लिए प्रयोगधर्मी बनकर काम करते रहे। खत्म होता सपा का जनाधार, बसपा के प्रति बढ़ती नाउम्मीदी के चलते प्रदेश में कांग्रेस इस समुदाय की पहली पसंद हो सकती है।

कुल मिलाकर इस समुदाय के पत्ते अभी खुले नहीं है। लेकिन कहीं पार्टी और कहीं प्रत्याशी को पसंद कर लक्ष्य हासिल करने में भी दुविधा हो रही है।

और, इस दुविधा को खत्म करता कोई दल नहीं दिख रहा है, बस मोदी के नाम से डराकर मुसलिमों को एकजुट होने की अलख जगा रहे हैं।

लोकसभा के चुनाव में निर्णायक मत होते हैं मुसलिम
हरिद्वार - 3.50 लाख
टिहरी - 75 हजार
नैनीताल - 2.00 लाख
अल्मोड़ा - 35 हजार
पौड़ी - 45 हजार
नोट : अल्मोड़ा सीट रानीखेत, टनकपुर, पौड़ी सीट पर कोटद्वार, रामनगर में है निर्णायक।

दम तोड़ रही है मुसलिमों से जुड़ी योजनाएं
:- इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए अल्पसंख्यकों के लिए पंद्रह सूत्रीय कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति गठित की थी। समिति का मुख्य कार्य केंद्र की हर योजना में अल्पसंख्यकों की भागीदारी सुनिश्चित करना है। मुख्य सचिव इसके अध्यक्ष होते है।

कानूनन इस समिति की बैठक तीन महीने में एक बार जरूर होनी चाहिए। लेकिन समिति के सदस्य आरए खान बताते है कि पिछले तीन साल में तीन बैठकें हुई। पिछली बैठक ही पांच महीने पहले हुई थी।

दरअसल, अल्पसंख्यक कल्याण के लिए इस सबसे बड़ी कमेटी का खुद का स्थाई दफ्तर तक नहीं है।

:- एमएसडीडीपी (मल्टी सेक्टोरियल डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट प्लान) अल्पसंख्यकों के लिए एक महत्वपूर्ण योजना है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर केंद्र ने इसे कई साल पहले शुरू किया था।

पहले इस योजना में हरिद्वार व ऊधमसिंहनगर जिले को लिया गया और बाद में देहरादून के विकासनगर ब्लॉक को भी शामिल किया गया। लेकिन हालत इसकी भी खराब ही है।

23 करोड़ की किश्त जारी तो हुई लेकिन धरातल पर कुछ नजर नहीं आया। रुद्रपुर में तो इस योजना के तहत बगैर जमीन के ही पोलिटेक्निक बन जाने का उपभोग प्रमाणपत्र तक शासन को भेजा गया।

:- आईडीएमआई (इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फॉर माइनोरिटी इंस्टीट्यूशन) । इस योजना के तहत केंद्र को प्रस्ताव भेजे जाते हैं लेकिन तीन चौथाई मुसलिम ही इससे अपरिचित है।

:- मदरसों में शिक्षा की गुणवत्ता : मदरसे अपने स्तर से शिक्षकों की नियुक्त की जाती है जिनका वेतन केंद्र से मिलता है। लेकिन प्रस्ताव शासन में धूल फांकते रहे और शिक्षकों की 2012-13 के वेतन की धनराशि भी नहीं मिल सकी।

पंद्रह सूत्रीय कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति को सक्रिय करने से ही सारी समस्याएं दूर हो जाएगी। अल्पसंख्यकों के लिए चलाई गई योजनाएं दम तोड़ रही है। समय पर बैठकें नहीं होने से अल्पसंख्यकों का अहित हो रहा है।
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- आरए खान, सदस्य, पंद्रह सूत्रीय कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति
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