यह परंपरा साल 1911 में भक्त रूपचन्द ने शुरू की थी। भक्त रूपचन्द 1911 में अमन की जोत लेकर पाकिस्तान (तब देश का बंटवारा नहीं हुआ था) के मुल्तान शहर से पैदल चलकर हरिद्वार आए थे। उन्होंने वरुण देव व मां गंगा की आराधना कर विश्व में शांति व अमन के लिए प्रार्थना की थी। तब से यह उत्सव मनाया जा रहा है।