वर्ष 1962 के युद्ध में अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर चीन की सेना को जसवंत सिंह रावत ने अकेले 72 घंटे तक रोके रखा था। जैसे ही चीन की सेना को पता लगा कि दूसरी ओर सिर्फ एक सैनिक है तो उन्होंने घेरा बनाकर धोखे से जसवंत सिंह को मार दिया और उनका सिर धड़ से अलग कर साथ ले गए।
जसवंत सिंह साढ़े इक्कीस साल की उम्र में शहीद हो गए थे। उनकी बहादुरी की सेना इस कदर कायल है कि मरणोपरांत भी उन्हें प्रमोशन मिलते गए। उनके नाम का काफी बड़ा मंदिर अरुणाचल में है।
माना जाता है कि आज भी जसवंत सिंह रोज आते हैं। रोज उनके लिए नाश्ता, खाना जाता है, रोज उनकी वर्दी धोई जाती है, जूतों में पॉलिश की जाती है और नई चादर बिछाई जाती है। लोगों का कहना है कि शहीद जसवंत अब भी सीमा पर ड्यूटी करते हैं।
महावीर चक्र विजेता शहीद जसवंत सिंह रावत की 93 वर्षीय मां लीला देवी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बेटे के लिए परमवीर चक्र की मांग की है।
लीला देवी ने बीते दिसंबर माह में प्रधानमंत्री को पत्र भेजा था। पत्र का जवाब नहीं मिलने से वह निराश हैं। उनका कहना है कि वह अपनी ओर से पूरा प्रयास करेंगी। लीला देवी के बेटे विजय सिंह रावत ने बताया कि भाई के लिए परिवार मिलकर संघर्ष करेगा।
जब तक मां जीवित हैं, वह चाहती हैं कि उनकी आंखों के सामने शहीद जसवंत सिंह को परमवीर चक्र मिल जाए। इसके लिए हमने अपनी ओर से प्रधानमंत्री को पत्र भेजा है। अब तक जवाब नहीं आने से हम निराश जरूर हैं, लेकिन हम बार-बार अपनी मांग दोहराएंगे। हमारे भाई ने देश के लिए जान दी है। सरकार को चाहिए कि वह शहीद को परमवीर चक्र दे।