मनोरमा शर्मा डोबरियाल कूटनीतिक दांव-पेंच में माहिर थीं। यही वजह थी जब राज्यसभा सांसद प्रत्याशी के लिए बात चली तो पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का नाम भी पीछे हो गया। अचानक मनोरमा शर्मा को प्रत्याशी घोषित किए जाने से बहुगुणा खेमा सकते में आ गया था।
निचली पंक्ति के नेताओं की पैरवी
पार्टी नेताओं की पहली लाइन भले ही उनके माफिक न रही हो, लेकिन दूसरी और तीसरी लाइन के नेताओं ने मनोरमा शर्मा की हमेशा पैरवी की।
यही कारण था कि एक तरफ मनोरमा को राज्यसभा सांसद बनाए जाने के लिए नेताओं का एक गुट हाईकमान पर दबाव बना रहा था और दूसरी तरफ उसी दौरान जमीनी कार्यकर्ता उन्हें महानगर अध्यक्ष बनाए जाने के लिए जोर लगा रहे थे।
दोनों खेमें में थे समर्थक
मनोरमा शर्मा की खासियत यह थी कि उनके समर्थक बहुगुणा खेमे में भी थे और हरीश रावत खेमे में भी। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राज्यसभा सांसदी के लिए जब उनके नाम को हरी झंडी दी तो बहुगुणा खेमा इसका खुलकर विरोध नहीं कर सका था।
इस खेमे के ही दो-तीन मंत्रियों ने मनोरमा के नाम पर सहमति दी थी। संगठन में भी उनका दखल रहा है। वह खुद महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रही थीं और आखिर तक महिला कांग्रेस पर उनकी पकड़ रही।