पिरूल (चीड़ की पत्ती) से कोयला तैयार करने में सफलता मिलने के बाद अब जंगलात ने इसका उपयोग डैम बनाने में किया है। पिरूल से निर्मित चेकडैम पत्थर और सीमेंट के चेकडैमों की अपेक्षा अधिक मजबूत और कम खर्चीला भी है।
जिस स्थान पर इन्हें तैयार किया जा रहा है, वहां जैट्रोफा, सिंवाली जैसे झाड़ीनुमा पौधे भी रोपे जा रहे हैं ताकि इन्हें सुरक्षा मिल सके। अभी तक वन विभाग ने सौनी, द्वारसौं समेत जिले के कई स्थानों पर 16 से ज्यादा चेकडैम बना लिए हैं।
एक चेकडैम पर तीन क्विंटल पिरूल लगता है और दो हजार रुपए की लागत आ रही है। बरसाती नालों से आबादी क्षेत्र में होने वाले भू कटाव रोकने के लिए वन विभाग पूर्व में पत्थर सीमेंट के चेकडैम बनाता था, लेकिन इस बार नई तकनीक का प्रयोग किया गया है।
वन रेंजर दीवानी राम ने बताया कि बड़े नालों के लिए भी पिरूल निर्मित चेकडैम कारगर हैं। कैंपा योजना के तहत इसकी शुरूआत की गई है। पिरूल की बुनाई के लिए नारियल की रस्सी का प्रयोग होता है।